Saturday, 5 December 2015


सम और विषम अंको के बीच फँसी दिल्ली की यातायात प्रणाली,एक समाधान हमारा।                                       हाई-कोर्ट द्वारा दिल्ली सरकार को दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के लिये पड़ी फटकार को मद्दे-नज़र रखते हुए ,दिल्ली की सरकार ने एक नियम बनाने की तरफ कदम बढ़ाने और उस कदम के द्वारा दिल्ली में बढ़ते प्रदुषण को कम करने की एक कोशिश को कानूनी जामा पहनानेे की पहल करी।                     दिल्ली सरकार ने कुछ नियम दिल्ली की यातायात व्यवस्था पर लागू करने की बात करी जो कि पहली जनवरी 16 से लागू होने की बात कही गयी है। इस नियम के अनुसार दिल्ली में चलने वाली प्राइवेट कार और स्कूटर मोटरसाइकिल का बोझ सड़कों पर आधा करने की बात की गयी है,और उसे लागू करने के लिए एक सीधा नियम लागू करने की बात बताई जा रही है कि इक दिन सम नम्बरों वाली गाड़ियाँ सड़कों पर निकल सकेंगी एवं अगले दिन विषम नम्बर वाली,यानि जिन गाड़ियों के नम्बर के आखिर में 2,4,6,8,10होगा वो सारी गाड़ियाँ एक दिन सड़कों पर आ सकेंगीं और अगले दिन वो गाड़ियाँ सड़कों पर नहीं आ सकेंगी परन्तु  विषम अंकों,1,3,5,7,9वाली गाड़ियाँ सड़कों पर आ सकेंगीं।                           इस  व्यवस्था से दिल्ली की आधी गाड़ियाँ ही प्रतिदिन दिल्ली की सड़कों पर दौड़ सकेंगी। जिससे गाड़ियों से होने वाला प्रदुषण करीब करीब आधा हो जायेगा,या सरकारी गाड़ियों और पब्लिक ट्रांसपोर्ट ट्रकों,बसों के प्रदुषण को मद्देनज़र रक्खें तो चालीस प्रतिशत प्रदुषण तो कम हो ही जायेगा,ऐसा मानना है दिल्ली सरकार का।             इस व्यवस्था के लागू होने पर दिल्ली की पब्लिक ट्रांसपोर्ट जैसे डीटीसी बसों एवं दिल्ली मेट्रो पर बोझ काफ़ी बढ़ जाने की बात कही जा रही है और ऐसा अंदेशा भी जताया जा रहा है कि इस बोझ को वो सहन नहीं कर पायेंगी और सब गड़बड़ हो जायेगा।                                                                   इसी बात को लेकर दिल्ली की अरविन्द की आम आदमी की सरकार पर बीजेपी एवं कांग्रेस वाले हाथ धो कर पीछे पड़ गए हैं कि जैसे अरविन्द की आम आदमी की सरकार ने पिछले डेढ़ साल में ही दिल्ली का सारा वायु प्रदूषण पैदा किया है,इसके पहले की सरकारों की अदूरदर्शिता इसके लिए ज़रा सी भी जिम्मेदार नहीं है।                                             कम से कम दिल्ली सरकार इसके बारे में सोचने तो लगी है कि दिल्ली को इस वायु प्रदुषण से कैसे बचाया जा सकता है। अगर यही हालत रही तो सिंगापुर की तरह दिल्ली में भी गाड़ियों की संख्या निर्धारित करनी पड़ेगी और तब हर कोई गाड़ी खरीदने की भी नहीं सोच पायेगा,चलाना तो सपना होगा क्योंकि टैक्स इतना अधिक होगा जो एक करोड़पति भी नहीं दे पायेगा।                                                                इससे अच्छा तो यही होगा कि दिल्लीवासी जो कानून अरविन्द सरकार ला रही है उस पर अमल करने के बारे में सोचें और उसको कैसे सफल बना कर दिल्ली को वायु प्रदुषण से थोड़ी छूट दिलाने में  मददगार बन सकते है,ऐसा विचार बनाएं।                                                                      हमारा सुझाव दिल्ली सरकार को                               आधी गाड़ियों को एकदम से सड़कों पर से हटा देने के मद्देनज़र जो बोझ सरकारी डी टी सी बसों और मेट्रो पर पड़ने वाला है,और जिसके बारे में आम धारणा है की वो बोझ नहीं उठा पाएगीं जबतक उनकी संख्या नहीं बढाई जाएगी,उसके लिये हमारा यह सुझाव है:::::::                             सम और विषम अंको वाली गाड़ियाँ अलग अलग दिन चलवाने की जगह ,1,11,21,31,41,51,61,71,81,91  नम्बर जिन गाड़ियों के आखिर में हों उन गाड़ियों को एक दिन और अगले दिन ,2,12,22,32,42,52,62,72,82,92नम्बर वाली उसके बाद तीसरे दिन3,13,23:::::चौथे दिन4,14,24::::;इसी तरह गाड़ियों को चलाने की अनुमति पहले एक महीने तक दी जाये।                                                                      इस फार्मूले से फायदा यह होगा कि जो पचास प्रतिशत गाड़ियाँ सीधे सीधे सड़कों से हटने वाली हैंएवं जिससे सरकारी यातायात संसाधनों पर बुरा असर पड़ने की उम्मीद जताई जा रही है,वह नहीं होगा क्योंकि इस फार्मूले से सिर्फ दस प्रतिशत गाड़ियाँ ही प्रतिदिन दिल्ली की सड़कों से हटेंगी।मतलब पहले महीने गाड़ी वालों को सिर्फ तीन दिन गाड़ी के बगैर रहना पड़ेगा,इससे सिर्फ दस प्रतिशत बोझ ही डी टी सी की बसों और मेट्रो पर पड़ेगा,जिससे एक अंदाजा भी लग जायेगा कि अगर पचास प्रतिशत बोझ  पड़ेगा तब कितनी बसें और कितनी मेट्रो बढ़ानी पड़ेंगी।इसलिए पहले हमारे बताए हुए फार्मूले को इस्तेमाल करके अरविन्द जी को दिल्ली में प्रयोग करना चाहिये,जिससे किसी को ज्यादा परेशानी भी नहीं होगी एवं आगे कैसे इस समस्या से निपटना है इसका अंदाजा भी हो जायेगा।KC Sir

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Thursday, 9 July 2015

      भारतीय इन्टरनेट स्पीड की दुर्दशा का मज़ाक,दुनिया की सबसे बड़ी वीडियो साईट कम्पनी u-tube ने, उड़ाया 
        आपको ध्यान होगा हमने 22 Oct 2014 को एक लेख लिखा था,जिसका शीर्षक था "लंगड़ी चींटी जैसी चाल का मारा,भारतीय इंटरनेट उपभोक्ता बेचारा "उस लेख के द्वारा हमने भारत में इंटरनेट की दिनो दिन खराब होती हुई हालत का जिक्र किया था|
         हमारे उस लेख में कही हुई एक - एक बात का अनुमोदन Ericsson co. ने अपने एक सर्वे के द्वारा 28 Apr 2015 को किया था,जिसमे उन्होंने पाया था कि,भारत में 2G और 3G इन्टरनेट स्पीड एक सामान हैं तथा 60% से 70% भारतीय इन्टरनेट उपभोक्ता बहुत परेशान हैं आदि आदि |
        अब हमारे उस लेख की सत्यता पर मोहर लगाने वाला एक विज्ञापन (AD Film) दुनिया की सबसे बड़ी video site co.  U-TUBE  ने जारी किया है,जिसके बोल कुछ इस प्रकार हैं ;-
        रुक-रुक खाये झटके ,घूम घूम है अटके,रुक- रुक खाये झटके,.........इंडिया में ऑनलाइन विडियो देखना काफ़ी सर घुमाने वाला काम है,इसलिये U-TUBE लाया है नया ऑफलाइन फीचर   
      हमारे पहले लेख को लिखे हुए नौ महीने हो गये,अगर इन्टरनेट की स्पीड के बारे में हमारी सरकार ने कुछ सोचा होता तो शायद आज भारत को U-TUBE Co.के द्वारा इतना बेइज्जत होना न पड़ता, क्योंकि विज्ञापन में खासकर भारत (india) का नाम लिया गया है|
        परन्तु हमारे संचार मंत्री जी को शायद यह विज्ञापन देख कर भी शर्म नहीं आयेगी,क्योंकि उन्हें तो मीडिया के सामने खुश होकर यह बताने में मजा आता है की कॉल ड्रॉप तो उनकी भी होती है | न ही हमारी पांचों बड़ी इंटरनेट प्रोवाइडर कम्पनिओं को शर्म आएगी क्योंकि उन्हें तो जब उपर से शह मिली हुई है कि भारत की बेवकूफ पब्लिक को खूब लूटो,खूब रेट बढाओ,स्पीड कम करते जाओ,कोई कुछ बोलने वाला नहीं है,पेमेंट भी एडवांस में लो,सही काम भी न करो फिर भी बेचारी पब्लिक तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ पायेगी| क्योंकि कम्पनिओं के ऊपर बैठे लोग,उनके कार्य का आकलन करने वाले लोग ,शायद उनको फायदा पहुचाने के लिए कार्य कर रहें है न कि भारत की जनता के हितों की रक्षा करने के लिए,क्योंकि पिछले डेढ़ साल में इंटरनेट  के रेट दोगुने हो गए और स्पीड आधी हो गयी,परन्तु किसी भी नियामक अधिकारी का कोई बयान आपने देखा,सुना या पढ़ा नहीं होगा|
         जब सइयां भए कोतवाल तो डर काहे का | नियामक संस्थान ने ऐसी कोई व्यवस्था ही नहीं बनाई है जिससे वो कम्पनिओं वो बाध्य कर सके,उनसे कम से कम एक स्पीड की भरपाई न होने पर सवाल उठा सके,ऐसी स्थिति में कम्पनियां भरपूर फायेदा उठा रहीं हैं और पब्लिक मजबूर है उनके द्वारा लुटने के लिए |
         नियामक संस्थान ने शिकायत करने का भी जो तरीका बनाया है वो भी कुछ ऐसा है की आपको उसी से शिकायत करनी है जो आपको सता रहा है,यानि कि जो आपको मार रहा है,आपको उसी से कहना है की भईया ,जोर से न मारो ,बहुत चोट लग रही है ,ज़रा धीमे मारो,आप की बड़ी मेहरबानी होगी ,वर्ना आप अपनी शिकायत अपने से ऊपर वाले भईया से कर दो ,की आप हमें मार रहे हो वो आप को सजा दें| भई वाह क्या तरीका है |
          हमारे आकलन के हिसाब से भारत में इन्टरनेट बहुत बदतर हालत में है और पूरी तरह से भगवान् भरोसे है,और हमारे प्रधान मंत्री जी इसी इन्टरनेट के भरोसे ' डिजिटल इंडिया 'का ख्वाब भारत की भोली-भाली जनता को दिखा रहें है,जबकि डिजिटल इंडिया स्कीम का सारा दारोमदार इन्टरनेट पर ही कायम होगा, कैसे होगा यह या तो मोदी जी जानते हैं या भगवान् जानता है, हम तो बस वो ही जानते है जो दिखाई दे रहा है, जैसे बैंकों में लगी लाइनें,क्या हुआ कनेक्टिविटी नहीं है, सरकारी ऑफिस में लगी लाइनें ,क्या हुआ काम नहीं हो सकता कंप्यूटर में कनेक्टिविटी नहीं है, रेलवे रिजर्वेशन काउंटर ,लम्बी लाइनें परेशान लोग ,क्या हुआ जब कनेक्टिविटी आएगी तब काम होगा |
          ऐसे सैकड़ों उदाहरण से आप लोगों का रोज वास्ता पड़ता होगा,आखिर ये सब इन्टरनेट की स्पीड और खराबी के कारण ही तो है,तो क्या हमारे इन्टरनेट के भाग्य-विधाता ,संचार मंत्री जी इस तरफ भी थोड़ा ध्यान देंगें?
            धन्यवाद |
    KC Sir              [K.C.MEHROTRA]
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Tuesday, 7 July 2015

                    भारतीय बुजुर्ग बने फेसबुक के प्रेमी, क्या कारण - क्या निवारण 
       फेसबुक सोशल साईट पर सक्रिय रहने वाले लोगों से अगर आप पूछें या वो खुद आपको बतायें,तो आपको इस तथ्य की जानकारी होगी की पिछले साल दो साल से फेसबुक पर " people you may know" की जो लिस्ट दिखाई पड़ती है,उस लिस्ट में 45-50 साल या उससे ऊपर की उम्र के पुरुष या महिलाओ के नाम(खासकर पुरुषों के नाम और चित्र )बहुत अधिक दिखाई पड़ने लगे हैं|
       क्या आपने कभी इस बात पर ध्यान दिया,अगर नहीं तो हमारी आपसे प्रार्थना है कि आप यदि फेसबुक का इस्तेमाल खुद करते हैं तो खुद देखें, अन्यथा अपने घर के उस सदस्य से इस बात की जानकारी लेने की कोशिश करें जो फेसबुक का इस्तेमाल करता हो,कि क्या पिछले साल दो साल में यह बदलाव आया है?
       अगर यह बदलाव वाकई आया है तो,क्यों आया है,किसलिए आया है,इसकी ज़रूरत क्यों पड़ी | हमें इस बदलाव के पीछे के सभी कारणों को जानने की कोशिश करनी होगी|
       क्या बुजुर्गों को अपनों के द्वारा ठुकराया गया?
       क्या बुजुर्गों को अपनों से वह अपनापन नहीं मिला जिसके वो हक़दार थे?
       क्या बुजुर्ग अपने-आप को अकेला महसूस करते है?
       क्या बुजुर्ग अपनों से प्यार व् देखभाल न मिलने के कारण अपने को उपेछित महसूस करते हैं?
       क्या बड़ी संख्या में बच्चों का अपनी जीविका कमाने के कारण अपने मान-बाप से दूर रहने के कारण? 
       शायद और भी बहुत से कारण हो सकते हैं,जिसकी वजह से आज के बुजुर्ग ने अपने आप के लिए यह रास्ता चुना,और वे अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए फेसबुक से दोस्ती करना चाहते हैं,या यों कहिये की फेसबुक के रास्ते दोस्त ढूंढ कर अपने एकांत को खुशगवार बनाना चाहते हैं|
        शायद फेसबुक की तरफ हाथ बढ़ाने वाले बुजुर्गों के दिमाग में आया होगा की अपनों से न सही अपने समाज से,या नाते-रिश्तेदार से,आस पड़ोस वालों से, बचपन के बिछड़े साथियों से,साथ में पढ़े सहपाठियों से,और यह सब भी न सही,तो सारे जहां में फैले करोणों लोगों में से कुछ तो ऐसे दोस्त फेसबुक बना ही देगा,जो हमारे एकांकीपन को दूर कर सकेंगें,दूर बैठे ही सही कुछ बातें कुछ हँसी-मजाक आपस में कर सकेंगें|
         हमको तो इसमें कुछ गलत नहीं लगता है,इसके द्वारा हमारे बुजुर्गवार अगर अपना समय ख़ुशी ख़ुशी बिता सकें,अपने आपको व्यस्त रख सकें,एवं साथ-साथ दुनिया में क्या चल रहा है,इस-सबसे भी वे अछूते न रहें,तो उनके अपने लोग,जो उन्हें किसी भी कारणवश समय नहीं दे पा रहे थे या दूर होने के कारण उनकी देखभाल नहीं कर पा रहे थे,वे भी खुश होंगें| 
         तो आइये हम - आप मिल कर आज यह प्रतिज्ञा करें की हमारे जो भी बुजुर्गवार अभी तक फेसबुक आदि किसी भी सोशल साईट से नहीं जुड़ें हैं,हम उनको उससे जोड़ने का भरपूर प्रयास करेंगें,जिससे वो लोग भी हमारे नवजवानों के साथ कंधे से कन्धा मिला कर गर्व का अनुभव कर सकें,और एक बार फिर से उनके अन्दर स्फूर्ति का संचार हो एवं जीवन जीने की ललक बढ़े,वे अपने-आप को उपेछित न समझें| 
         अगर आपको इस बारे में कुछ कहना है तो आपका स्वागत है|
         धन्यवाद्
    KC Sir              [K.C.MEHROTRA]
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Monday, 29 June 2015




                     धीरे धीरे मरती लखनऊ की " पहले आप-पहले आप " वाली तहजीब 
        लखनऊ  नवाबों के जमाने से अपनी इस तहजीब के लिए जाना जाता रहा है| आज तक बहुत सारे चलचित्रों में लखनऊ की इस तहजीब का जिक्र होता रहा है, बॉबी फिल्म के तो एक गाने में भी इस तहजीब का जिक्र आया था,जिसमे इसके कारण नवाब साहेब की गाड़ी छूट गयी थी|
         परन्तु कहते हुए दुःख होता है की,पिछले 45 वर्षो से लखनऊ में प्रवास के दौरान मैं निरंतर इस तहजीब को तिल-तिल मरते हुए देख रहा हूँ,और शायद अब "पहले आप " के बेटे ने जन्म ले लिया है जो बड़ा बिगड़ा हुआ बेटा है , जिसका नाम मै आपको आगे बताऊंगा|
          1970 से 1980 के दशक में पहले आप कहते हुए एक दूसरे को सम्मान देते हुए फिर भी काफ़ी लोग मिल जाते थे, ऐसा नहीं था की सिर्फ उम्र में छोटे लोग ही अपने से बड़ी उम्र के लोगों को यह सम्मान देते थे परन्तु उम्र में बड़े लोग अपने से छोटे लोगों को भी "पहले आप" कह कर सम्मान देते नज़र आ जाते थे| 
           1980 से 1990 के दशक में लखनऊ शहर में कुछ नयी रिहायसी कालोनी बननी शुरू हुई,पुराने लखनऊ से कुछ परिवार वहां जाकर बसे एवं कुछ परिवार लखनऊ से बाहर के भी आकर यहाँ बसना शुरू हो गए|
            1990 से 2000 के दशक में इस प्रक्रिया ने जोर पकड़ना शुरू किया, क्योंकि लखनऊ चारों दिशाओं में तेजी के साथ बढ़ने लगा, क्योंकि राजधानी होने की वजह से सरकारी गैरसरकारी प्रतिष्ठानों के कार्यालय तेजी से खुल रहे थे, उनमे काम करनेवालों की वजह से लखनऊ की आबादी तेजी से बढ़ रही थी, ये वो आबादी थी जो मूलरूप से लखनऊ की रहनेवाली नहीं थी |
            लखनऊ के आस पास के शहरों तथा कुछ बड़े शहरों से लोग आ-आ कर यहाँ बसने लगे,ये लोग नयी बसी कालोनियो में ही ज्यादातर रहने लगे ,लखनऊ में नये बसे इन लोगों का संपर्क पुराने लखनऊ में रहने वाले लोगों से ज्यादा नहीं होता था ,या आप कह सकते है की न के बराबर होता था|
              लखनऊ में दूसरी जगहों, शहरों से आयी हुई जनता एवं लखनऊ की पुरानी तहजीब के साथ जी रही जनता का एक दूसरे से अधिक संपर्क में न रह पाना, और बाहर से आने वाली जनता की आबादी का, लखनऊ की अपनी बढ़ती हुई आबादी, से भी आगे निकल जाना, भी एक कारण है कि लखनऊ की वो पुरानी तहजीब, हम पुराने लखनऊ के पुराने वाशिंदे हमारे शहर में नये आये लोगों को सिखा नहीं सके |
              सन 2000 के बाद तो आबादी बढ़ने का सिलसिला इतनी तेजी से बढ़ा की,लखनऊ के पुराने वाशिंदे भी नये आये लोगों के रंग में रंगने लगे क्योंकि बड़े बूढ़े लोग तो धीरे धीरे अल्लाह को प्यारे हो गये,और नयी पौध अपने बुजुर्गों के पुराने संस्कारों को संजोकर रख पाने में विफल हो गयी,जिसके पीछे बहुत से कारण हैं उन कारणों को विस्तार से फिर कभी बताएंगें|
             अब तो शायद आप किसी से रेलवे क्रासिंग पर ये कह देंगें कि "पहले आप" तो शायद वो आपको पागल समझ के पहले निकल जायेगा और आप देर तक वहां खड़े होकर सोचते रहेंगे,क्योंकि आजकल लखनऊ के लोग  "पहले हम " में विश्वास करते हैं चाहे उसके लिए उन्हें लड़ाई झगड़ा ही क्यों न करना पड़े|
              "पहले हम " ही "पहले आप" का बेटा है जो अब लखनऊ की जनता के दिलोदिमाग पर इस कदर छाया हुआ है कि इसकी वजह से रोज सैकड़ों एक्सीडेंट हो रहे है, लड़ाईयां हो रही है,कोई एक दूसरे को अपने से आगे जाते हुए देख नहीं सकता है, तो वो "पहले आप "क्या कहेगा?
               जिसने " पहले आप" का मंज़र देखा है और उसे अब "पहले हम" के वीभत्स दर्शन करने पड़ रहे हैं, ऐसे चंद बचे हुए पुराने लखनऊ के वाशिंदों से कभी मिलना हो जाये तो आप उन्ही से पूछना कि आज का लखनऊ उन्हें कैसा लगता है, क्या उनका दिल अब लखनऊ में रहने को करता है?
           कभी कभी सोचते हैं कि क्या " पहले आप" वाले पुराने लखनऊ को फिर से जी पाने का मौका मिलेगा? क्या फिर से लखनऊ में एक दूसरे के प्रति प्रेम और आदर का भाव देखने को मिलेगा? या फिर वो सब एक सपना बन कर रह गया है|
           कहते हैं उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए,और आज कल की नयी पौध सबको बहुत सिखाती है कि " बी-पॉजिटिव "  तो क्या हम इनसे यह उम्मीद लगा कर रक्खें कि लखनऊ में एक बार फिर   "पहले आप"  वाले दिन आयेंगें|
           आप बतायें आप इस बारे में क्या सोचते हैं|
             
    KC Sir              [K.C.MEHROTRA]
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Wednesday, 24 June 2015

      अखिलेश सरकार का एक अद्बभुत फैसला,जो बहुतो को आत्महत्या करने को प्रेरित करता है
      उत्तर प्रदेश के एक पत्रकार जिसने आत्महत्या की या उसकी हत्या कर दी गयी,अभी पता नहीं है,पुलिस केस हो चुका है,तफतीस जारी है,अभी कुछ नहीं कहा जा सकता है की तफतीस में क्या निकल के आयेगा|
      पत्रकार की तरफ से जो दलील दी गयी एवं जो मरते समय की मजिस्ट्रेट के सामने दी हुई गवाही ,सोशल मीडिया पर पत्रकार के द्वारा लिखा हुआ बयान जिसमे अखिलेश जी के मंत्रिमंडल के एक वरिष्ठ मंत्री जी का नाम लिया गया था,ऐसे बहुत सी बातें हैं जो साफ़ इशारा कर रही हैं की पत्रकार की हत्या में मंत्रीजी का हाथ हो सकता है,जिसमे सबसे बड़ी बात"मरते समय मजिस्ट्रेट को दिया गया बयान है "
       पत्रकार के परिजनों ने अनशन किया की सीबीआई के द्वारा जांच होनी चाहिए,जिसको कि उत्तर प्रदेश सरकार ने नहीं माना एवं पत्रकार के परिजनों को अखिलेश जी ने मिलने के लिए बुला लिया |
       सरकार की तरफ से अभी तक यही कहा जा रहा है कि फोरेंसिक रिपोर्ट से शुरूआती तौर पर जो निकल कर सामने आ रहा है,उससे लगता है की पत्रकार ने अपने आप को आग स्वयं ही लगाईं थी|
        जब पत्रकार गुहार लगा रहा था की उसको मंत्री जी ने धमकी दी है,उसे जान का खतरा है,तब तो प्रदेश की सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया,अपने मंत्रीजी से कोई पूछताछ नहीं करी,मरते समय के बयान में मंत्रीजी का नाम आया तो भी शासन हरकत में नहीं आया,परन्तु जब पत्रकार के परिजनों ने अनशन किया तो उनको राजधानी बुला लिया गया|                                                                                                                  अब आता है ख़ास मुद्दा  
       जब अभी तफतीस जारी है,कुछ तय नहीं हुआ है,कि पत्रकार ने स्वयं खुद को आग लगाईं या उसको आग लगाईं गयी,तो पत्रकार के परिजनों को 30 लाख रूपए देना और दो परिजनों को सरकारी नौकरिया देने का वादा करने का क्या ओचित्य है?
       यह तो दिखाई दे रहा है की यह पत्रकार की मौत के मुआवजे के रूप में उसके परिजनों को सौगात दी गयी है|
                                             सरकार के इस कदम से दो प्रश्न उत्पन्न होते हैं|
1.क्या यह मुआवजा पत्रकार की हत्या हो गयी है उसके लिए है? या 
2.क्या यह मुआवजा पत्रकार ने आत्महत्या की है उसके लिए है?
         अगर हत्या होने का मुआवजा है,तो हत्यारा पुलिस की हिरासत में क्यों नहीं है छुट्टा क्यों घूम रहा है?
         अगर आत्महत्या करने का मुआवजा है तो क्या सरकार हर आत्महत्या करनेवाले को अब से 30लाख रूपए और 2 परिजनों को सरकारी नौकरियां देगी?
          सरकार की उस दलील को अगर ध्यान में रक्खें,की सुरुआती फ़ोरेंसिक जांच में पता चला है की पत्रकार ने आत्महत्या की है,और सरकार की पुलिस के द्वारा मंत्रीजी को हिरासत में न लेना,इन दोनों बातों से तो यही लगता है की यह मुआवजा पत्रकार के परिजनों को पत्रकार द्वारा आत्महत्या करने के उपलक्ष्य में ही मिला है|
                                                               सरकार से हमारा प्रश्न
       श्रीमान अखिलेशजी क्या आपका यह कदम प्रदेश की जनता को आत्महत्या की ओर प्रेरित नहीं करता है?
       70% गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही जनता के सामने 30 लाख रूपए और 2 बच्चों को सरकारी नौकरी मिलने का प्रलोभन क्या प्रदेश की जनता को आत्महत्या करने के लिए प्रेरित नहीं करेगा?
        हमारे बाद हमारे बीबी बच्चे मजे में जिंदगी यापन करेंगे ,क्या यह लालच एक गरीब को आत्महत्या करने को नहीं उकसाएगा?
        और अगर भगवान् न करे यह सोच गरीब के दिल में बैठ गयी तो आने वाले समय में आपको सरकारी ख़जाने का मुह खोल के रखना पड़ेगा,तब कहाँ से लायेंगे करोड़ों रूपए और लाखों सरकारी नौकरियां ?
         अभी भी समय है ,इस मुआवजे को आत्महत्या नहीं हत्या के मुआवजे में बदलने का प्रयत्न करिए और केस को सीबीआई के हाथ में दे दीजिये ,जिससे प्रदेश की जनता आपकी जयजयकार करे और ,आप लाखों लोगों की आत्महत्या करने में मदद करने के पाप से भी बच जायें|               धन्यवाद.
   KC Sir              [K.C.MEHROTRA]
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Monday, 22 June 2015

     क्या बाप की गलतियों से अगर बेटा सबक न ले,तो नुकसान जनता का होता है?
       अभी तक आप लोंगों ने जो कहावत सुनी थी,उसके हिसाब से जो इंसान समझदार होता है वो अपने बुजुर्गों की गलतियों से सबक लेता  हैं और वह गलती नहीं करता हैं जो उनके पिताजी ने की थी और उससे नुक्सान हुआ था|
       यहाँ पर हम आपको एक ऐसे पुत्र की बात बताने जा रहे हैं जिसके पिता ने आज से 10-15 साल पहले एक गलती की थी,जिससे उत्तर प्रदेश सरकार को 20-25 करोड़ रूपए का नुकसान हुआ था.उस गलती को सुधारने में फिर करोड़ों रूपए खर्च हुए|
       उसी पिता के पुत्र के द्वारा आज फिर से वही गलती दोहराई जा रही है,फिर से करोड़ों रूपए खर्च हो रहें हैं,और जिस काम के लिए यह पैसा खर्च हो रहा है,उस कार्य के लिए इस्तेमाल न तब हुआ था न अब होगा|
      इस कहानी में पिता हैं माननीय मुलायम सिंह जी यादव एवं पुत्र की भूमिका में हैं माननीय अखिलेश जी यादव,हमारे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री जी|
      मुलायम सिंह जी जब मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने गोमती नगर में 4-5 किलोमीटर लम्बा साईकिल ट्रैक बनवाया था,सड़क के दोनों तरफ,लोहे की मजबूत रेलिंग और खूबसूरत प्रकाश व्यवस्था के साथ,उस समय कहते हैं 20-25 करोड़ रूपए सरकारी खजाने से खर्च किये गए थे|
       दस -पंद्रह साल तक उस साईकिल -ट्रैक पर इतनी साईकिल भी नहीं चली की एक साईकिल प्रतिदिन का भी औसत निकल सके|यानि की जनता के पैसे का बंटाधार हो गया,या दुरूपयोग किया गया|अगर उस समय इस पैसे का सदुपयोग किया जाता तो शायद तीन-चार ओवर ब्रिज लखनऊ में उस समय बन चुके होते|
      जिस समय मुलायम जी ने साइकिल ट्रैक बनाया था उस जगह पर कुछ नहीं बना था,मतलब सड़क के किनारे की जगह खाली थी|
      10-15 साल बाद जब देखा गया की वो साईकिल ट्रैक किसी काम नहीं आ रहा है तो सरकार ने उसे तुडवा दिया,जिसमे फिर करोड़ों रुपयों का खर्च आया,जो पब्लिक की गाढ़ी कमाई से दिया जाता है|
    ये तो बात हुई पिता की,अब पुत्र क्या करने जा रहा है वो समझिये और उसका मुल्यांकन कीजिये
      माननीय अखिलेश जी अपने पिता की गलती से सबक न लेते हुए,उन्ही के पदचिन्हों पर चलने का प्रयास शुरू कर चुके हैं,बल्कि पिता से एक कदम आगे|पिता जी ने तो खाली ज़मीन पर साइकिल -ट्रैक बनवाया था, परन्तु पुत्र मज़बूत बने हुए फुटपाथों एवं खूबसूरत रेलिंग्स को तुड़वाकर साइकिल ट्रैक बनवा रहे हैं,वोह भी हज़रात गंज जैसी जगह पर, जहाँ साइकिल चलती कम ही नज़र आती है,एवं जहाँ पर इतनी जगह नहीं है कि लगातार साइकिल -ट्रैक बन सके,20 मीटर साइकिल ट्रैक, फिर सड़क,फिर फुटपाथ,क्या साइकिल वाले ऐसे साइकिल चलायेंगें?आप लोग खुद हजरतगंज जा कर पब्लिक के पैसे की बर्बादी होते हुए देख सकते हैं|
       जो पैसा इस कार्य में बर्बाद किया जा रहा है,उससे लखनऊ भर में बहुत सारी सड़के, फुटपाथ,गलियां इत्यादि बनवाई जा सकती है|जिस जनता ने अखिलेश जी को मुख्यमंत्री बनवाया है वो उन्हें समझाने की कोशिश करें,और भगवान् से प्रार्थना करें की वो उन्हें सदबुद्धि दे जिससे वो यह कार्य करवाना बंद कर दें|
       शायद पुत्र पिता की गलतियों से सबक इसलिये भी नहीं ले रहा है,क्योंकि नुक्सान न तो पिता के पैसों का हुआ था, और नुक्सान न ही पुत्र के पैसों का होने जा रहा है|नुक्सान तो बेचारी जनता के पैसों का हो रहा है|उन दोनों का तो..........
       अंत में अखिलेश जी मेरी आपसे करबद्ध प्रार्थना है की,कृपया पिताजी से हुई भूल का संज्ञान लेते हुए,पब्लिक के पैसे का दुरूपयोग बंद कीजिये|
       धन्यवाद्|
   KC Sir              [K.C.MEHROTRA]
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Tuesday, 7 April 2015

                    पर उपदेश कुशल बहुतेरे
         दो-तीन दिन पहले अपने प्रधानमन्त्री मोदी जी का भाषण सुना जिसमे उन्होंने LPG सिलिंडर पर मिलने वाली subsidy के बारे में अपने विचार व्यक्त किये थे,उन्होंने अपने वक्तव्य में देश के उन लोगों से एक अपील की थी जो सक्षम हैं अर्थात जिनकी आमदनी इतनी है कि उन्हें रसोई गैस पर मिलने वाली subsidy नहीं लेनी चाहिए.
         यह आमदनी कितनी हो यह नहीं बताया था,परन्तु कुछ उदाहरण दिए थे कि किन लोगों को आगे आ कर subsidy खुद छोड़ देनी चाहिए,और यह भी बता डाला की इससे जो पैसा सरकारी खजाने में बचेगा उसको गरीबों के कल्याण के कार्यक्रम में लगाया जाएगा.
                      हम कुछ तथ्य रसोई-गैस subsidy से सम्बंधित आपके सामने रख रहे हैं
1.आजकल एक सिलिंडर पर करीब 220/00रूपए सब्सिडी दी जा रही है.
2.एक परिवार को ज्यादा से ज्यादा 12 सिलिंडर एक साल में दिए जाते हैं.
3.कुछ परिवार 5,6,7,8 या 9 सिलिंडर ही ले पाते हैं एक साल में.
4 हम एक अनुपात लगा लें की एक परिवार लगभग 8 सिलिंडर एक साल में लेता है.
5.इस हिसाब से एक परिवार को 8x220=1760=00 रूपए की subsidy एक साल में सरकार से प्राप्त हो रही है.
6.इस परिवार में हम मान लेते हैं,कि 3 सदस्य हैं,यानि प्रति व्यक्ति करीब 587=00 रूपए की गैस subsidy एक साल में एक व्यक्ति को सरकार दे रही है.
7.1760=00रूपए एक साल में कोई बहुत बड़ा खर्चा नहीं है,जो ज्यादा कमाने वाले खर्च न कर सकें,और subsidy न छोड़ सकें.
8.10 या 20 हज़ार रूपए महीना कमाने वाले मनुष्य के लिए 220=00 रूपए महीने की subsidy छोड़ देना कोई बड़ी बात नहीं है.
9.जो लोग इनकम टैक्स देते हैं,यानि की जिनकी आमदनी 4 या 5 लाख रूपए साल से ज्यादा है,उनके लिए साल में 1760=00 रूपए की subsidy छोड़ देना कोई बड़ी बात नहीं होगी.
         इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए हम सोच सकते हैं कि मोदी जी के आवाहन पर करोंड़ों लोगों को अब तक गैस subsidy छोड़ देनी चाहिए थी.
   पर ऐसा हुआ नहीं,क्यों नहीं,यह समझने के लिए आपको एक संत की कहानी याद करनी पड़ेगी 
         एक बार एक माँ एक संत के पास अपने बच्चे को लेकर पहुंची जिसके दांत खराब हो रहे थे क्योंकि वो मीठा बहुत खाता था,माँ का मानना था की महान संत हैं उनकी बात बच्चे को समझ में आ जाएगी और बच्चा मीठा खाना बंद कर देगा.जब माँ ने संत को बोला,महाराज आप इसे समझा दीजिए यह मीठा बहुत खाता है,यह सुनकर संत ने उस माँ से बोला,बच्चे को एक महीने के बाद लेकर फिर आओ,तब हम उसे समझायेंगे.
        एक महीने के बाद माँ बच्चे को लेकर फिर से संत के आश्रम में पहुंची,संत ने बच्चे को अपने पास बैठाया और उससे बोला 'बेटा मीठा मत खाया करो,बहुत खराब चीज होती है'.इतना कहकर संत ने माँ से कहा कि बच्चे को ले जाओ ये अब मीठा नहीं खायेगा.
        माँ बच्चे को आश्रम के बाहर लेकर आयी और बच्चे को बाहर बैठाकर फिरसे अंदर गयी और उसने संत से पूछा,महाराज अगर आपको सिर्फ बच्चे से इतना ही बोलना था तो आपने हमें एक महीने बाद क्यों बुलाया,पिछली बार ही बच्चे से यह क्यूं नहीं कह दिया?
                              संत ने माँ के कौतूहल को समझते हुए उसे विस्तार से समझाया
        पिछली बार जब तुम बच्चे को लेकर आयी थीं और तुमने बच्चे की आदत का जिक्र करके हमसे उसे मीठा खाने को मना करने के लिए कहा था तब हमने उसे इसलिये कुछ नहीं कहा क्योंकि तब हम भी मीठा  बहुत खाते थे,अगर हम उसे मना करते तो उसपर हमारी बात का कोई असर नहीं होता.
        हमने तुम्हे एक महीने के बाद बुलाया,उस बीच हमने अपनी मीठा खाने वाली आदत को पूरी तरह से छोड़ दिया,तब हमने बच्चे को मीठा न खाने को बोला,अब हमारी बात का बच्चे के उपर असर अवस्य होगा,परन्तु यदि पिछली बार हमने यही बात बोली होती तो उसका असर बच्चे पर नहीं होता.
            कोई बात हम खुद करे और दूसरों को न करने को बोलें तो क्या कोई मेरी बात मानेंगा?
       अब आप समझिये की मोदी जी की बात का असर क्यों नहीं हो रहा है.मोदी जी खुद तो subsidy ले रहे हैं और देशवासियों को कह रहे हैं कि आप लोग subsidy लेना बंद कर दें.
        मोदी जी कैसे subsidy ले रहे हैं और कितनी ज्यादा subsidy ले रहें है,यह जानने के लिए आपको कुछ तथ्यों को समझना होगा.
        कुछ समय पहले आप लोगों ने टी.वी.अखबार एवं रेडियो पर मोदी जी के बारे में एक ख़बर देखी,पढ़ी एवं सुनी ज़रूर होगी,कि मोदी जी ने सचिवालय की कैन्टीन में भोजन थाली खायी. मोदी जी ने भी बोला था की 30 या 33 रूपए में बड़ा स्वादिस्ट भोजन था.
        आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सचिवालय कैन्टीन में M.P.एवं MINISTERS के लिए नास्ता चाय एवं भोजन सब कुछ बहुत ही कम (subsidised) कीमतों में मिलता है.सचिवालय कैन्टीन को subsidy तब भी  दी जाती है जबकि M.P.लोगों को चाय-नास्ते के लिए भत्ता अलग से मिलता है,जो अपने-आप में बहुत ज्यादा होता है.
                              अब जानिये कि मोदी जी subsidy कैसे प्राप्त कर रहे है
        वो एक थाली जो मोदी जी ने 30 रूपए में खायी थी,और जो उन्हें बहुत स्वादिस्ट लगी थी उसमे 90 रूपए की subsidy सरकार की तरफ से डाली गयी थी,यानि कि वो थाली कैन्टीन को 120 रूपए में पड़ती है जो ministers एवं M.P.लोगों को 30 या 33 रूपए लेकर दी जाती है और बाकी के 90 रूपए सरकारी खजाने से subsidy के रूप में चुकाये जाते हैं.
        मोदी जी उनके मंत्रीगण एवं M.P.कितनी अधिक subsidy ले रहे हैं,यह जानने के लिए साधारण गडित जानना ही काफी होगा.
        एक M.P. के एक समय के भोजन पर 90 रूपए की subsidy.मतलब यदि 20 दिन ये सज्जन भोजन कैन्टीन में कर लें तो,1800 रूपए सरकारी खजाने से subsidy के रूप में चुकाना पड़ेगा,अब सोचिये अगर यह सज्जन 200 दिन एक थाली खाएं तो 18000 रूपए subsidy सरकार चुकाएगी.
         एक परिवार को 1760 रूपए की subsidy रसोई गैस के लिए सरकार देती है,पुरे साल भर में,दूसरी तरफ एक मंत्री की 20 थाली के लिए 1800 रूपए की subsidy सरकार देती है. एक  ओर एक m.p.की एक समय की थाली पर 90 रूपए की subsidy और दूसरी ओर एक नागरिक को साल भर में सिर्फ 587 रूपए की रसोई-गैस subsidy.
                                                             बहुत नाइंसाफ़ी है
        आपको जानकर हैरानी होगी कि एक साल में सचिवालय कैन्टीन को सरकारी खजाने से 11 करोड़ रूपए वर्ष 2010-2011 के लिए subsidy के रूप में दिए गए थे,जो अब बढ़ कर 20 से 25 करोड़ रूपए प्रति वर्ष या उससे भी अधिक  हो गए होंगे.
          20 से 25 करोड़ रूपए से हिन्दुस्तान के एक से डेढ़ लाख परिवारों को रसोई गैस subsidy पूरे साल भर के लिए दी जा सकती है,मतलब करीब 40 से 45 लाख लोगों को रसोई-गैस सब्सिडी दी जा सकती है.             


          मोदी जी आपसे सविनय निवेदन है की यदि आपको समझ में आ गया हो कि लोग आपकी बात को क्यों नहीं मान रहे हैं,तो संत की तरह व्यवहार कीजिये और सचिवालय की कैन्टीन को सरकार की तरफ से subsidy देना बंद करवा कर अपने उपर से subsidy लेने का आरोप हटा कर ,एक बार फिर से भारतीय जनमानस से अपील करें,फिर देखिये कैसे लोग आपकी बातों को मान कर रसोई गैस subsidy लेना बंद करना शुरू करते हैं. हम  आपको वादा करते हैं कि  हम खुद आपके इस शुभ कार्य में पूरा सहयोग करेंगे                                                                                                                                                     धन्यवाद्
   KC Sir              [K.C.MEHROTRA]
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