Tuesday, 18 June 2019

झटका बिजली का

उ प्र की जनता को लगेगा बिजली का बड़ा झटका।
तैयार रहें झटका खाने के लिये, यदि आप उत्तर प्रदेश में रहते हैं,क्योंकि योगी जी के विद्युत मंत्री पण्डित श्रीकांत शर्मा जी देने जा रहे है एक उपहार कर्रेंट के रूप में ,उत्तर प्रदेश की जनता को, जिन्होंने 63 सांसदों को जिताकर भेजा है।

पण्डित श्रीकान्त शर्मा विद्युत मंत्री उत्तर प्रदेश बिजली बिल में बढ़ोतरी कर प्रदेश की जनता को बड़ा झटका देने वाले हैं,उत्तर प्रदेश की जनता पहले से ही बढे बिजली दर से त्राहि त्राहि कर रही हैं ऐसे में पण्डित श्रीकान्त शर्मा को बहुत फूँक फूँक कर कदम रखना पड़ेगा,जब वो बिजली के दाम बढ़ाने की सोच रहे हैं। उत्तर प्रदेश में पहले से ही बिजली के दाम केजरीवाल की दिल्ली के मुकाबले दुगने और तिगुने से भी ज्यादा हैं,और बीजेपी शासित गुजरात से भी बहुत ज़्यादा हैं।

      दाम बढ़ाने से उत्तर प्रदेश की अनुशासित जनता चाहें कुछ न बोले,परन्तु विरोधी दल के लोग कतई चुप नहीं बैठेंगे।अगर मंत्री जी को समझ में नहीं आ रहा है कि किस तरह से बिजली के दाम न बढ़ाये जाएं तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल से सलाह ले लें कि वो कैसे पिछले "चार वर्षों " से इतने कम दाम में दिल्ली को बिजली पहुँचा रहे हैं और दर में कोई  वृद्धि नहीं की है।जनता को लाभ पहुंचाने के लिए अपने विरोधी अरविन्द केजरीवाल से मशवरा करने में कोई हिचक नहीं करनी चाहिए,और अगर केजरीवाल से बात करने में हिचक हो तो गुजरात के अपने समकक्ष मंत्री से सलाह लें,क्योंकि अगर बिजली के दाम बढ़ गए तो बीजेपी को विरोधी दलों के बड़े प्रहार सहने पड़ेंगें साथ ही चुनाव में जनता का आक्रोश झेलना पड़ेगा| विद्युत मंत्री पण्डित श्रीकान्त शर्मा एवं मुख्यमंत्री योगी जी की मंशा अगर जनता पर अतरिक्त बोझ नहीं डालना है तो पूरी तरह से सलाह मशवरा करने के बाद ही कदम उठाना जनहित में होगा |
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KC Sir

Wednesday, 29 May 2019

संस्कारों की महत्ता


आज कुछ ऎसा हुआ,जो संस्कारों पर चलने वाले के साथ ही होता है,कम से कम हम तो ऐसा ही मानते हैं।संस्कार शब्द संस्कृति से बना है जो कि मनुष्य के जीवन को सुसंस्कृत और परिष्कृत करता जाता है,उसे बहुत लोगों से कुछ-कुछ अच्छा बनाता जाता है।ये कुछ-कुछ धीरे धीरे करके बहुत बड़ा हो जाता है और वो मनुष्य दूसरों से अलग नज़र आने लगता है।
     ये अलग वाला मनुष्य, कुछ कुछ खास तो ज़रूर करता है,पर वो हर मनुष्य को नज़र नहीं आता,या उसमें बहुत लोगों को कुछ ख़ास या अच्छा दिखाई नहीं पड़ता।इसके पीछे भी वही कारण है,'संस्कार',जी हाँ, अच्छाई को परखने के लिये भी अच्छी नज़र रखने वाला मनुष्य ही होना चाहिये तभी वो अच्छी बात को आत्मसात कर पायेगा।
    अब हम आपको आज की उस घटना की ओर ले चलते है।
   दोपहर के बारह बज रहे थे,सूर्य देवता अपनी प्रचंड अग्नि से मानो हर वस्तु को परिष्कृत कर के उसमे से मानो उसका सर्वश्रेष्ठ बाहर ले आना चाहते थे।हम एक चार पहियों वाली 15 किलो की अटैची और एक कपड़े का 8-10 किलो का बैग उस अटैची पर रखकर धीरे धीरे अपने घर के पास वाली गली में खुड़ दुड़ी सड़क पर चल रहे थे और उस अटैची को भी आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे थे,चूंकि तीन दिन से बुखार में पड़े थे और कुछ कमज़ोरी भी लग रही थी तो चाल में वो फुर्ती नहीं थी जो होनी चाहिए थी।
     तभी एक मधुर आवाज़ आकर हमारे कानो में अमृत घोल गई,"भैया,लाइये हम पहुँचा देते हैं,कहाँ तक ले जाना है?"इस आवाज को सुनकर पीछे देखा तो हमारे एक मित्र की पत्नी मुस्कुराती हुई नज़र आईं और हमें एक आत्मिक सुखः की अनुभूति करा गयीं।
हालांकि हमने उनसे सहयोग नहीं लिया परन्तु हमको ऎसा लगा कि हमारा सामान अपने गंतव्य तक बिना किसी मेहनत के पहुँच गया।वो मेरे साथ साथ बात करते हुए सड़क तक आइं जहाँ तक मुझे जाना था।
    उनका इतना कहना,हमें प्रसन्न कर गया।यद्यपि हमने सँकोचवश उनसे मदद नहीं ली फिर भी उनके इतना कह देने भर से हममें जो आत्मबल का संचार हुआ,उसने हमें हमारे गंतव्य तक पहुंचाने में मदद की।
   अब बात आती है संस्कारो वाली,क्या इस बीच हमको और लोगों ने नहीं देखा?क्या और कोई हमारा जानने वाला उस गली में नहीं था?क्या हमसे कम उम्र के लोग वहाँ पर नहीं थे जो हमसे ये कह सकते थे,या हमारे सामान को पहुंचा सकते थे?जी नहीं जिस किसी ने भी हमें देखा,उसमें वो संस्कार नहीं थे जो उस संभ्रांत महिला में थे,और ये संस्कार ही हैं जो एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य से अलग दिखलाते हैं।वो महिला हमारे एक CA मित्र की पत्नी हैं,बहुत अच्छे संभ्रांत, भरे - पूरे सम्मानित ,पैसे वाले परिवार की हैं।
   अब हम आपको बताते हैं कि हमारे साथ ऎसा क्यों हुआ,क्योंकि हम भी इस तरह से दूसरों की मदद करते रहते है।हम भी जब अपने घर की सीढ़ियां चढ़ रहे होते हैं या हमें अपनी बिल्डिंग की कोई महिला गली में सामान उठाकर चलती हुई नजर आती है तो हम उनसे सामान लेकर उनके घर तक ,या सीढियां चढ़ा कर उनके फ्लैट तक पहुंचाने में मदद करते हैं और ये संस्कार हमें हमारे पिताजी के द्वारा बताई गई एक कहानी से अब से 40 साल पहले मिला था।वो कहानी कुछ ऐसे है:-
    40 साल पहले की जाड़े की सुबह,हमारे पिताजी कहीं बाहर से लौटकर आये थे।उनके पास एक चमड़े की अटैची थी और एक होल्डार था,(जिसमे बिस्तर रख कर लोग सफर पर जाया करते थे)खुन खुन जी की कोठी पर रिक्शे से उतर कर वहाँ पर मौजूद मजदूर लोग यात्रियों का सामान उठाकर उनके घर तक पहुँचा दिया करते थे।उस दिन सुबह सुबह कोई मजदूर नहीं आया था,तो हमारे पिताजी को लगा कि शायद समान उन्हें ही उठाना पड़ेगा,तभी वहाँ एक और रिक्शा आकर रुका और उसमें से उतरने वाले सज्जन पुरुष मेरे पिताजी की तरफ मुखातिब हुए और बोले "चाचाजी,अरे चलिए हम आपका समान घर तक छोड़ आते हैं।"
      ये संस्कार थे,उस समय के लड़कों के कि उन्होंने हमारे पिताजी की अटैची हाथ में ली और होल्डार सिर पर रखकर सुरंगी टोले तक छोड़कर आये जबकि उनका घर खुन खुन जी की कोठी के पीछे,बहोरन टोले में ही था।
    ये सज्जन पुरुष हमारे कोई रिश्तेदार नहीं थे,सिर्फ हमारे ताऊ के लड़के के दोस्त थे।परन्तु उस समय वो लखनऊ से बाहर सेंट्रल बैंक की किसी शाखा में बतौर मैनेजर कार्यरत थे,जहाँ से वो भी उस दिन लौटकर आ रहे थे।
    ये कहानी हमारे पिताजी ने हमें बताई थी,तबसे हम किसी की भी सहायता करने में गुरेज़ नहीं करते हैं,चाहें वो मेरा अपना हो,चाहें पराया।
    आजकल के बच्चों से मेरा ये विनम्र निवेदन है कि,अपनो से बड़ों की मदद करने में गुरेज़ मत करें,इससे आपके व्यक्तित्व में निखार आएगा और आपका आत्मविश्वास एवम आत्मबल बढ़ेगा।
 धन्यवाद।