Wednesday, 15 October 2014

  डिस्पोसब्ल गुड्स के इस्तेमाल से बनते कूड़े का नॉन-डिस्पोसब्ल अम्बार        दुबारा इस्तेमाल में न लाने वाले सामान के लिए डिस्पोसब्ल शब्द का इस्तेमाल करके क्या नाम रखने वाले ने गलती करी? आप विचार करें सोचें, समझें, ध्यान लगाएं और फिर अपने विचारों से हमें अवगत करायें.

        स्वच्छ भारत के मोदी जी के आवाहन के मद्दे नज़र,अगर हम विचार करें तो हम पायेंगे कि कूड़ा इस अभियान का असली हीरो है,कुछ लोगों की नज़र में यह विलेन यानि खलनायक भी हो सकता है,क्योंकि इस कूड़े को ही हटा कर भारत को स्वच्छ बनाया जा सकता है जो की मोदी जी चाहते हैं.
        स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत करते समय शायद मोदीजी ने यह इतने आगे तक नहीं सोचा होगा की आज भारत में कूड़ा कैसा होता है,या कितने प्रकार का होता है.
        क्या आज के भारत का कूड़ा सफेदपोश नेता, अधिकारी,बड़े-बड़े कारोबारी,खिलाड़ी इत्यादि के सिर्फ झाड़ू लगा देने भर से साफ़ हो जायेगा?
         आज के भारत का कूड़ा आज से तीस साल पहले के भारत के कूड़े से बहुत अलग किस्म का हो गया है.तीस-चालीस साल पहले के भारत के कूड़े को एक गड्डे में गाड़ कर मट्टी से बंद कर छोड़ देने पर कम्पोस्ट खाद बन जाती थी जो खेतों में काम आती थी ,ऐसा हमने पढ़ा था.अगर उस तरह का कूड़ा आज भी होता तो इस सफाई अभियान से बहुत फायेदा होने वाला था.
     मगर साहेब आज के भारत का कूड़ा बड़ा जड़ीला हो गया है,शायद आज के भारतके............जैसा. आप समझदार है खुद समझ लें.
          अगर हमें कूड़ा साफ़ करना है और एक स्वच्छ भारत की तस्वीर दुनिया को दिखानी है, (जो कि हमें अवस्य करना है.) तो हमें पहले समझना होगा की भारत में कहाँ,किस जगह,किस तरह का कूड़ा पाया जाता है,और उसे साफ़ करने के लिए कौन सा तरीका या विधि अपनानी पड़ेगी.
          आज के कूड़े में दो तरह के पदार्थ पाए जातें हैं,
1. वो जो नष्ट हो जाते हैं.
2. वो जो नष्ट नहीं होते हैं.
           वो कूड़ा जो नष्ट हो जाता है हमारे आपके लिए चिंता का विषय भी नहीं है,क्योंकि यह कूड़ा सदियों से है और आसानी से इसे साफ़ किया जा सकता है,या इससे खाद बनाई जा सकती है.परन्तु वो दूसरे प्रकार का कूड़ा जो नष्ट नहीं होता,आज पुरे संसार के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है.
            अब हम अपने असली मुद्दे,यानि डिस्पोसब्ल गुड्स के इस्तेमाल से होने वाले नॉन डिस्पोसब्ल कूड़े के बढ़ते अम्बार से कैसे बचा जा सकता है पर आते हैं.
              तरह -तरह के डिस्पोसब्ल गुड्स आज भारत में इस्तेमाल होने लगे हैं,जो कुछ इस प्रकार हैं;
1.चाय पीने के लिए कप,जो की पी.पी.प्लास्टिक या प्लास्टिक कोटेड पेपर से बने होते हैं और आजकल सारे हिन्दोस्तान में करोड़ों की तादाद में रोजाना इस्तेमाल हो रहे हैं,यह कप सहरों की नालियों में आपको हजारों की तादाद में पड़ें मिलेंगे जो की नालियों को चोक करने का काम बखूबी करते हैं.
2.खाना खाने वाली प्लास्टिक की या थर्मोकोल की थालियाँ,प्लेट,चम्मच कटोरी इत्यादि जिनका चलन दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है,कूड़ा बनाने में बहुत मददगार साबित हो रही हैं.
3.पी .वी.सि.कोटेड पाउच,जो की पान मसाले,तम्बाकू, बच्चों की टॉफी,दूध,रसोई के मसाले,चोकलेट,आलू चिप्प्स इत्यादि न जाने किस-किस चीजों को पैक करने के काम आ रहे हैं,पुरे देश भर में सड़कों पर,नालियों में,रेलवे लाइन के किनारे बिखरे नज़र आयेंगे जो कि आने वाले समय में बहुत विकराल रूप लेने वाले हैं.
4.पी.वी.सि.या पी.पी. प्लास्टिक से बने लिफाफे, थैलियाँ और झोले भी आज नॉन डिस्पोसब्ल कूड़े को बढाने में बहुत सहायक हो रहे हैं.
5.मेडिकल लाइन में इस्तेमाल होने वाली सिरिंज और प्लास्टिक की टेस्ट टयुब,स्टूल और यूरिन टेस्ट में इस्तेमाल होने वाली डिब्बियां भी इस कूड़े को बढाने का काम कर रहे हैं.
6.आजकल एक और चीज है जो गन्दगी को बढ़ा रही है वो है बच्चों और बड़ों के द्वारा इस्तेमाल होने वाले डैपेर(diper).
            विकसित देशों ने डिस्पोसब्ल गुड्स के इस्तेमाल के बाद बनते कूड़े को रीसायकल करने का प्रबंध करके इस कूड़े से फिर से सामान बनाने का इंतजाम कर लिया है,जिससे उन देशों में डिस्पोसब्ल गुड्स का कूड़ा उतनी भयंकर इस्थिति में नहीं पहुँच पा रहा है जितना कि भारत में
             भारत में डिस्पोसब्ल गुड्स से उत्पन्न हुए कूड़े का प्रबंधन करना,यानि उसे अलग अलग श्रेडियों में छाटना,बीनना,बाटना और फिर उसे रीसायकल करना अभी न के बराबर हो पा रहा है.
              जबतक हम भारत में डिस्पोसब्ल गुड्स के कूड़े को सड़कों ,नालियों और कूड़ाघर में जाने के बजाये वापस कारखानों में रीसायकल होने के लिए भेजने का इंतजाम करने में सक्षम नहीं हो जाते तब तक शायद हम स्वच्छ भारत के सपने को साकार करने में विफल रहेंगें.
            क्योंकि डिस्पोसब्ल शब्द का इस्तेमाल इसलिये किया गया था की आप स्तेमाल करें डिस्पोस करें और उसे फिर से बना कर फिर इस्तेमाल करे, और यह चेन बनी रहे,न कि एक बार इस्तेमाल करके उसे कूड़े में दाल दो.
            आप सब से हमारी यही प्रर्थना है की आप कम से कम डिस्पोसब्ल गुड्स का इस्तेमाल करें,जितना हो सके ना करें,जितना करें,उसको सही तरीके से सही जगह पर डिस्पोस करने का कष्ट करें और मोदी जी के स्वच्छ भारत के सपने को साकार करने में अपनी भागेदारी निभाएं.                                     धन्यवाद.

Saturday, 11 October 2014


  लंगड़ी चींटी जैसी चाल का मारा,भारतीय इन्टरनेट उपभोक्ता बेचारा

         ऐसा बताया जाता है की भारत में ऐसे बेचारे,एक दो या दस बीस हज़ार या सौ दो सौ लाख नहीं,बल्कि करीब पचीस करोड़ हो गए हैं.सुनने में कुछ अजीब सा लगता है फिर हँसी भी आती है,क्योंकि यह सारे बेचारे,अपने को बेचारा कहे जाने पर नाराज भी हो सकते हैं,क्योंकि इनमे से ज्यादा तर पढ़े-लिखे,अच्छी हैसीयत वाले,सम्भ्रान्त नागरिक हैं.
          अब आप जानना चाहेंगे कि यह सब बेचारे कैसे बन गए? 
         मेरी नज़र में जो मनुष्य अपनी गलती न होने के बावजूद,दूसरों की गलतियों की सजा भुगतने पर मजबूर हो,बार-बार लगातार,तथा उनकी सुनने-वाला कोई न हो,तो वे व्यक्ति बेचारे कहलाने योग्य हो जाते है.
         यह भारतीय इन्टरनेट उपभोक्ता अपने-आप में तो बेचारे हैं,परन्तु पूरी दुनिया की आबादी के हिसाब से देखा जाये तो भारत इन्टरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या के हिसाब से दुनिया में दूसरे नम्बर पर आता है,परन्तु यह भी सत्य है की यदि आबादी के प्रतिशत के हिसाब से भारत में इन्टरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या देखी जाये तो यह दुनिया के देशों में नवें स्थान पर है.
          अब बात यह आती है की,जब दुनिया में इन्टरनेट इस्तेमाल करने वालों में भारतीय उपभोक्ता नम्बर दो पर है तो फिर वोह बेचारा कैसे हो गया?
     भारतीय इन्टरनेट उपभोक्ता को बेचारा बनाने वाले निम्न कारण हैं:
1. अमेरिका के इन्टरनेट उपभोक्ता जिस एक mb data के लिए ३००/०० भारतीय रूपए खर्च करते हैं,भारतीय उपभोक्ता उसी एक mb data के लिए ३३००/०० भारतीय रूपए(मतलब ग्यारह गुना ज्यादा )खर्च करते हैं.और इसके बावजूद दाम अभी भी दिन दुने रात चौगुने वाली कहावत के अनुरूप बढ़ रहे हैं.
2.  अमेरिका या अन्य देशों में जो स्पीड इन्टरनेट की मिलती है हमारे भारत में उससे दस गुना कम स्पीड   मिलती है.
3.  भारत में जो स्पीड आपके प्लान में आपको बताई जाएगी उसकी आधी या चौथाई स्पीड भी अगर आपको प्राप्त हो जाये तो आप अपने आपको बहुत भाग्यशाली समझियेगा ,हालांकि ऐसा होना,निकट भविष्य में तो संभव दिखता नहीं है.
4.  अगर आपको बताया गया की आपके प्लान की स्पीड 3.1mbps है तो समझ लीजिये की आपको जो स्पीड आएगी वोह,ज्यादा से ज्यादा 300kbps होगी,वोह भी कभी कभी,झलक दिखलाएगी.लंगड़ी चींटी की चाल जैसी दो सेकंड के लिए 50kbps,फिर चार सेकंड के लिए 15kbps,फिर तीन सेकंड के लिए 80kbps,फिर पांच मिनट के लिए 0kbps,फिर तीस सेकंड के लिए 300kbps.यह आँख-मिचौली हमारे उपभोक्ता को खेलनी पड़ती है,या यों कहिये कि झेलनी पड़ती है.
                  उपरोक्त कारणों की वजह से भारतीय इन्टरनेट उपभोक्ता बेचारा बन कर रह गया  है                  आज अपने प्रधानमंत्री मोदी जी, जो कि हर तरह से, हर काम में आगे से आगे इन्टरनेट के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की बात करते हैं,क्या भारतीय इन्टरनेट उपभोक्ता की इस बेचारगी से अनभिज्ञ हैं? यदि ऐसा है तो और भी दुखद बात है और यदि ऐसा नहीं है तो उन्हें भारतीय इन्टरनेट की इस दुर्दशा की तरफ फ़ौरन ध्यान देकर इसको स्वस्थ, बलवान एवं स्फूर्तिवान बनाने की तरफ पूरा ध्यान देना चाहिए, क्योंकि वे जिस ओर भारत को ले जाना चाहते हैं,उस गंतव्य की पहली,दूसरी और तीसरी सीढ़ी है:                                           1. इन्टरनेट की सहज उपलब्धता
2. इन्टरनेट की असीमित गति एवं
3. इन्टरनेट की सस्ती दरें
        जिस दिन भारत इन्टरनेट की दुनिया में विकसित देशों के समकक्ष खड़ा हो पायेगा ,उसदिन से ही हम मोदी के सपनो का भारत देख पाएंगे अन्यथा नहीं,इस बात को हमारे प्रधानमंत्री एवं उनके दूरसंचारमंत्री जितनी जल्दी समझेंगे उतना अच्छा होगा.
        इसलिये कृपया इन्टरनेट सर्विस प्रोवाइडर कम्पनियों की मनमानी रोकिये रोज दाम बढ़ानेवाली प्रतिस्पर्धा बंद कीजिये तथा दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई)को उनके कार्य छेत्र की जानकारी कराइए, की यह प्राधिकरण उपभोक्ता की भलाई के लिए बनाया गया था, न कि सर्विस प्रोवाइडर कम्पनियों की जेबें भरने में मदद करने के लिए,क्योंकि पिछले छ-आठ महीने में इन्टरनेट सेवाओं के दाम जिस मनमाने तरीके से बढ़ें हैं और आज भी बढ़ रहे है ऐसा लगता नहीं है की कोई नियामक प्राधिकरण कार्य भी कर रहा है.
         २०१२ में जब ख़बर आयी थी की अनिल अम्बानी के भाई दूरसंचार के छेत्र में आ रहे है तभी उनकी तरफ से अखबारों में छपा था की उनकी कम्पनी इन्टरनेट की उस समय चल रही दरों को दस गुना कम कर देंगी.परन्तु ,उस समय की दरों से दो से तीन गुना दाम बढ़ चुके हैं(यानि की अगर उस समय कोई दर १०० रूपए प्रति माह थी,जो मुकेश अम्बानी की कम्पनी १० रूपए प्रति माह करने की बात कर रही थी,वो दर आज १० रूपए की बजाय २०० रूपए या उससे भी अधिक है.) और कोई सुध लेने वाला नहीं है.
          अगर आपको लगे की दूरसंचार के छेत्र में लूट मची हुई है तो कृपया इस लेख के बारे में अपनी राय से हमें अवस्य अवगत कराएँ.
         धन्यवाद                                                                                                                              KC Sir              [K.C.MEHROTRA]
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Tuesday, 16 September 2014

         एक मनुष्य को कितने मोबाइल फ़ोन की ज़रूरत हो सकती है? 
   बहुत दिनों से मन में विचार था कि आप लोगो से यह जानने की कोशिश करू की एक मनुष्य को ज्यादा से ज्यादा कितने मोबाइल की ज़रूरत पड़ सकती है,या कितने मोबाइल नम्बर एक मनुष्य के लिये काफी होंगे.
     पिछले दिनों हमारे प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी जापान गये थे,वहां पर उन्होंने एक भाषण के दौरान कहा कि 'हमारे देश मे १२५ करोड़ की जनसंख्या है और १५० करोड़ से भी ज्यादा मोबाइल नम्बर बिक चुके हैं"यह बात शायद उन्होंने देश की तारीफ़ और तरक्की को ध्यान में रखते हुए कही होगी,ऐसा हम सोचते हैं.
     आज हम आप के सामने कुछ प्रश्न रखते हैं ,जो निम्न हैं:
  १.क्या १५० करोड़ से ज्यादा मोबाइल नम्बर बिक जाना ख़ुशी की बात है?
  २.क्या १५० करोड़ मोबाइल नम्बर काम कर रहे हैं?
  ३.क्या १५० करोड़ मोबाइल नम्बर वास्तविक नाम और पते का सत्यापन करने के बाद दिए गये हैं,या बाद में उनका सत्यापन कर लिया गया है?
  ४.क्या १२५ करोड़ की आबादी वाले देश में १५० करोड़ मोबाइल नम्बर की ज़रूरत वाकई में है?
  ५.क्या १२५  करोड़ की सारी आबादी मोबाइल फ़ोन का इस्तेमाल करती है?
  ६.क्या १८ साल से कम आयु के बच्चे कानूनन मोबाइल फ़ोन का इस्तेमाल कर सकते हैं?
  ७.क्या गांवों में रहने वाली १० प्रतिशत से ज्यादा महिलायें मोबाइल फ़ोन का उपयोग करती होंगी?
  ८.क्या शहरों में रहने वाले ६० साल से अधिक उम्र वाले सारे बुजुर्ग मोबाइल फ़ोन का इस्तेमाल करते हैं?
  ९.क्या संख्या होगी इंटरनेट इस्तेमाल करने के लिये मोबाइल सिम खरीदने वालों की?
 १०.क्या हिन्दुस्तान का हर मोबाइल उपभोक्ता दो मोबाइल नम्बर इस्तेमाल करता है?
     उपरोक्त प्रश्नों के उत्तर अगर हम सरकारी आंकड़ों के हिसाब से जानने की कोशिश करेंगे,तो बहुत आश्चर्यजनक तथ्यों से हमारा सामना होगा.
     कुछ तथ्य इस प्रकार हैं.
  १.१५० करोड़ बिके हुए नम्बर में से १०० करोड़ से भी कम नम्बर जीवित अवस्था में हैं यानी कि उनका जीवन अभी बाकी है,परन्तु उन्हें रिचार्ज नहीं कराया जाता है,जिनकी संख्या १० से २० करोड़ के बीच होगी.(सही संख्या इसलिए नहीं बताई जा सकती है क्योंकि मोबाइल ओपेरटर कम्पनियां आकड़े दे नहीं पाती हैं.मोबाइल कम्पनियां सिर्फ यह बताती हैं कि किस महीने में उन्होंने कितने नये सिम बेचे.)
  २.बाकी बचे ८० करोड़ मोबाइल नम्बर में से १० करोड़ से अधिक नम्बर सिर्फ इसलिए ख़रीदे गये थे क्योंकि उस समय जो सौगात उस ऑफर के साथ आयी थी उसका लाभ लेना था.
  ३.अब बचे हुए ७० करोड़ मोबाइल नम्बर में से भी कितने जीवित अवस्था में हैं यह तो मोबाइल कम्पनियां ही बता सकती हैं या फिर सरकार.
    हमने आपके सामने यह प्रश्न इसलिए रखा है,क्योंकि हम जानना चाहते हैं कि ,कितने मोबाइल नम्बर एक व्यक्ति को रखने की इजाजत होनी चाहिए जिससे उसकी ज़रूरते पूरी हो सके और उसके हिसाब से कितने मोबाइल नम्बर कम्पनियों के द्वारा बेचे जाने चाहिए.
     हम चाहते हैं की आप हमें अपने विचार इस समस्या के समाधान के बारे में बताएं,जिससे कि धड़ल्ले से बिक रहे मोबाइल नम्बर(सिम)की बिक्री और अपराध जगत में हो रहे मोबाइल के गलत इस्तेमाल पर रोक लगाईं जा सके.
      इस समस्या के बारे में हम आगे भी आपसे चर्चा करेंगे ,परन्तु हम पहले चाहते हैं की इस पर पहले आप लोग एक बहस सोशल मीडिया पर छेड़े जिसकी कि हम शुरुआत कर रहे हैं.
      हमारी फेसबुक अथवा ट्वीटर प्रोफाइल पर आप हमें यह बताने का कष्ट करें कि एक व्यक्ति को कितने सिम रखने की ज़रूरत होनी चाहिए?
      हमें आपके उत्तर का  इन्तजार रहेगा.
    
   KC Sir              [K.C.MEHROTRA]
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Wednesday, 30 July 2014

   इंडियन आयल और गैस एजेंन्सीज  की मिलीभगत से होता फर्जीवाडा
      आज हम आपको इंडियन आयल की गैस एजेंसीज के द्वारा किये जा रहे ऐसे गोलमाल के बारे में बताने जा रहे हैं,जो बगैर इंडियन आयल की मिलीभगत के संभव नहीं हो सकता.इंडियनआयल का दावा है की उन्होंने कंप्यूटर के द्वारा गैस बुकिंग का जो तरीका निकाला है उससे,उपभोक्ता के मोबाइल से फ़ोन करके ही बुकिंग कराइ जा सकती है,उसके बाद बुकिंग कराते ही उपभोक्ता को s.m.s.जायेगा की उसका बुकिंग no.क्या है,उसके बाद जिस दिन invoice बनेगी उस दिन फिर s.m.s.जायेगा कि invoice no. क्या है.फिर जिस दिन डिलेवरी मैन गैस उपभोक्ता को देने जायेगा,उस दिन डिलेवरी हो जाने के बाद उपभोक्ता को s.m.s. जायेगा कि इस तारीख को डिलेवरी हो गयी.
       जब से ६ या १२ गैस एक साल में मिलने की बात हुई थी तब से एक परची डिलेवरी मैन उपभोक्ता से ले जाता है जिससे पता चलता है की इस साल की कौन से no. की गैस आपको पहुँच गयी,वो परची डिलेवरी मैन गैस एजेंसी में जमा करता था,या है,[इस बात में अभी गोलमाल है].उपभोक्ता के घर पर रक्खी परची के दूसरे भाग पर डिलेवरी मैन के हस्ताक्षर करवाने होते हैं,कि परची का एक भाग वो ले गया है और गैस की डिलेवरी दे गया है,वोह डिलेवरी मैन अपने हाथ से उस परची पर लिखता है की कौन से no. की गैस उपभोक्ता को मिली है,पहली,दूसरी,तीसरी या आगे .........
       अब आपको समझना होगा कि गैस एजेंसीज के लिए गोलमाल करने के लिये,इंडियन आयल ने बुकिंग सॉफ्टवेयर में एक गलती जानबूझ कर छोड़ दी.
      होना यह चाहिए था की उपभोक्ता का जो मोबाइल no. इंडियन आयल के पास अंकित [रजिस्टर्ड] है,उससे और सिर्फ उससे ही फ़ोन करके उपभोक्ता अपनी गैस बुकिंग करा सकता है.परन्तु ऐसा है नहीं किया गया.7/30/2014
                                           अब देखिये गोलमाल होता कैसे है 
      गैस एजेंसी वाला अपने रिकार्ड्स से पहले यह देखता है कि कौन से उपभोक्ता ने कम सिलेण्डर बुक कराये हैं,गैस एजेंसी वाला अपने रजिस्टर्ड मोबाइल no. से उस उपभोक्ता के गैस कनेक्शन no.की बुकिंग करा देता है,उपभोक्ता के पास s.m.s. जाता है,वोह सोचता है उसने तो गैस बुक नहीं कराई गलती से s.m.s. आ गया होगा.उपभोक्ता के पास दो चार दिन के अन्तेर पर s.m.s. पहुँचते है पर गैस वाला गैस सिलेण्डर देने नहीं आता है,उसको लगता है बेकार के s.m.s. थे.
        परन्तु उपभोक्ता के कोटे से एक गैस सिलेण्डर निकल कर बाज़ार में ऊँचे दामो  [black market] में बिक जाता है.एक सिलेण्डर पर ७०० से १००० रूपए का फायेदा गैस एजेंसी वाले को हो जाता है,जो शायद,नीचे से उपर तक जाता होगा.गैस की वो परची जब उपभोक्ता के पास से आयी नहीं तो गैस एजेंसी वाले ने यह कैसे समझ लिया की गैस सही जगह पहुँच गयी,उसके पीछे यही बात ठीक समझ में आती है की जब गैस एजेंसी वाले खुद इस काम को कर रहे हैं तो वो डिलेवरी मैन से क्यों पूछेंगे. महीने दो महीने के बाद जब उपभोक्ता अपनी गैस बुक कराता है और उसके पास गैस पहुंचती है और वोह परची देता है तो उससे बताया जाता है की एक बार आपने परची नहीं दी थी,आप वो परची भी दे दो.बहुत सारे उपभोक्ता उनकी बातों में आ जाते हैं क्योंकि उनको कम सिलेण्डर की जरुरत होती है.जो नहीं मानते हैं, उन्हें एजेंसी के कंप्यूटर पर दिखा दिया जाता है की देखिये ,इस दिन आपने गैस बुक कराई,इस दिन invoice बना ,इस दिन आपको गैस डेलेवर हुई,उपभोक्ता चुप हो जाता है बेचारा. 
      हम इस सामाजिक बुराई,मिलीभगत या गोलमाल को कैसे दूर कर सकते हैं?हमारा आपका सबका एक उत्तरदायित्व बनता है की हम समाज में फैली इन बुराइयों को दूर करने के उपाय तलाशें.आपको जो उपाय समझ में आ रहा हो हमसे बताएं,या किसी और तरह से समाज को अवगत करायें.हमको जो उपाए समझ में आ रहा है वो निम्न है.
 इस लूट गोलमाल कालाबाजारी को रोकने का एक प्रयास हमारी तरफ से 
      इंडियन आयल का सिलिंडर बुकिंग का जो सॉफ्टवेयर बना हुआ है उसमे कुछ बदलाव करने पड़ेंगे.जो निम्न हैं,
     1. सिलेण्डर की बुकिंग सिर्फ और सिर्फ उपभोक्ता के रजिस्टर्ड मोबाइल no.से ही हो,और s.m.s. जाये 
     2. invoice बनने पर फिर s.m.s. जाये.
     3. डिलेवरी देने जा रहा है आदमी जिस दिन और जिस समय फिर s.m.s. जाये. 
     4. एक ख़ास बात-डिलेवरी देने के समय डिलीवरी मैन उपभोक्ता के रजिस्टर्ड मोबाइल से इंडियन आयल के फ़ोन no. पर उपभोक्ता से ख़बर करवाये, बात करवाकर, s.m.s. करवाकर या IVR तकनीकि के द्वारा.जो भी आसानी से सम्भव हो सके,कि सिलिंडर उपभोक्ता को प्राप्त हो गया है.
     5. इससे कितने सिलेण्डर बुक हुए,कितने प्राप्त हुए सबका रिकॉर्ड सीधे इंडियनआयल के सॉफ्टवेयर में दर्ज होगा और गैस एजेंसी वाले या डिलेवरीमैन कोई भी गोलमाल या कालाबाजारी नहीं कर पायेंगे.
     6. उपभोक्ता परची रखने के झंझट से भी बचेंगे एवं गैस एजेंसीज वाले परची सँभालने तथा उपर पहुँचाने के झंझट से भी बचेंगे.
     7, गैस की कालाबाजारी रुकेगी जिससे,कम गैस सिलेण्डरकी खपत होगी, गैस पर सब्सिडी भी कम देनी पड़ेगी जिसके फलस्वरूप गैस के दाम कम हो सकेंगे. 
      आपको यह उपाय कैसा लगा,इस पर अपने विचार हमें अवस्य बताएं.धन्यवाद.
   
    K.C.MEHROTRA
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Tuesday, 22 July 2014


   
                आज कल का ज्वलंत विषय,बच्चो के हाथ में मोबाइल,कितना सही कितना गलत?

          यह आजकल का ही नहीं हर साल छह महीने मे यह  विषय ज्वलंत हो जाता है,क्योंकि कोई न कोई M.P.या M.L.A. इस बारे में कोई बयान जारी कर देता है,फिर क्या टीवी चैनल्स पर लम्बी लम्बी बहस चालू हो जाती हैं.समाज के गणमान्य व्यक्तियों को टीवी पर अपने विचार रखने का मौका मिलता है कोई कहता है,बच्चो के हाथ में मोबाइल नहीं देना चाहिए,जैसा की पिछले दिनों किसी M.L.A. साहेब ने कहा.टीवी के एंकर एवं उनके सहयोगियों को अपने अच्छे बुरे विचार रखने का मौका मिलता है.
          टीवी पर बहस में बच्चो और उनके माता-पिता को आमंत्रित किया जाता है.चैनेल के कुछ समझदार व्यक्ति बैठते हैं और बहस शुरू हो जाती है.एक घंटे का प्रोग्राम होता है,साठ मिनट में से चालीस मिनट व्यावसायिक विज्ञापन देखने दिखाने में बीत जाता है,बाकी बचे बीस मिनट में जो बहस होती है,उसमें से  बहुत सा समय बहस करने वालो के बीच में आपसी बहस आदि में निकल जाता हैं.
          टीवी चैनल्स को हफ्ते भर का मसाला मिल जाता है,विज्ञापन खपाने का,गणमान्य लोगों को मौका मिल जाता है टीवी पर अपनी शक्ल दिखाने का,और ऐसे व्यकतव्य देने का जिसका कोई अर्थ या मतलब नहीं निकलता.
          इस विषय से जिन लोगों पर असर पड़ना है,यानी माता-पिता एवं बच्चे,अपनी बात तो रखना चाहते हैं और रखते भी हैं जितना भी समय उन्हे मिलता है,परन्तु वो बातें गौड़ हो जाती हैं,उन बातो को वोह अहमियत नहीं दी जाती,जिससे इस समस्या का कोई हल निकले.
          M.L.A.साहेब का कहना है की पढने वाले बच्चे स्कूल में मोबाइल ले जाते हैं जिसका गलत उपयोग हो रहा है,बच्चे बिगड़ रहे हैं इसलिये स्कूल में मोबाइल ले जाना बंद होना चाहिए.उनके हिसाब से सरकार को को इस बाबत नियम बनाना चाहिए जिसका सख्ती से पालन होना चाहिए.
          बच्चों के माँ-बाप का कहना है,बच्चे दूर-दूर तक पढने, स्कूल एवं टयुसन लेने जाते हैं,घंटों घर से बाहर रहते हैं,उनके पास मोबाइल नहीं होगा तो उनको बच्चों की सलामती के बारे में कैसे पता चलेगा.माँ-बाप की बात में भी दम नजर आता है.
          अब बच्चों की बात आती है,उनका कहना है की मोबाइल तो हमारी जरूरत और अधिकार है.कोई ऐसे कैसे कानून बना देगा,कल को हमारे ऊपर कोई मुसीबत आती है और हमारे पास मोबाइल नहीं है,हम माता-पिता को खबर नहीं कर पाते हैं और घटना घट जाती है तो उसका जिम्मेदार कौन होगा?
          सालों हो गए हैं इस तरह की बहस होते हुए,आज-तक किसी ने कोई भी अंजाम निकाल कर नहीं दिया.हम आप से पूछते हैं क्या आपको इस समस्या का कोई हल दिखाई पड़ रहा है?यदि हाँ तो आप हमसे बताएं,यदि नहीं तो हम आपको इस समस्या का जो हल बताने जा रहे हैं,उस पर अपनी राय दे ,हमें बताये की हमारा हल कितना-सही या कितना गलत  है. हमें आपकी राय जानने का इन्तजार रहेगा.
         किसी भी समस्या का हल ढूंढने से पहले उस समस्या को जड़ से जानना एवं समझना जरूरी होता है.
       इस समस्या के साथ तीन बाते जुड़ी हुई हैं,बच्चे,उनके माता-पिता एवं मोबाइल.हमें यह जानना जरूरी है की बच्चे किस उम्र से किस उम्र तक के माने जायेंगे.बच्चे किस कक्षा से किस कक्षा तक के मान्य होंगे तथा मोबाइल किस प्रकार का मान्य होगा.
         ऊपर की तरफ हम बच्चों की उम्र अट्ठारह वर्ष मान सकते हैं,क्योंकि उसके उपर बच्चे वयस्कों की श्रेणी में आ जायेंगे.नीचे की तरफ हम बच्चों की उम्र छ वर्ष मान कर चलेंगें,क्योंकि आजकल बच्चे चार पांच वर्ष की उम्र से ही मोबाइल पर खेल खेलने लगते हैं.
         कक्षा के हिसाब से प्रथम या द्वितीय कक्षा से लेकर बारहवी कक्षा तक के बच्चों को हम इस श्रेणी में रखेंगे.
         वह सभी बच्चे इस श्रेणी में आयेंगे जो छोटे-बड़े किसी भी शहर में रहते हैं और उसी शहर में पास या दूर स्कूल पढ़ने जाते हैं.किसी दूसरे शहर में छात्रावास में रह कर पढ़ने वाले बच्चे इस श्रेणी में नहीं शामिल होंगे.
          अब मोबाइल के बारे में जान ले,मोबाइल दो प्रकार के होते हैं एक साधारण मोबाइल एवं दूसरा स्मार्ट मोबाइल.आजकल के बच्चे स्मार्ट मोबाइल रखना पसंद करते हैं.
          एक बात और मोबाइल सर्विस प्रोवाइडर दो प्रकार की सेवा प्रदान करते हैं,प्रीपेड और पोस्टपेड.आजकल के बच्चे प्रीपेड सेवा लेना पसंद करते हैं.
         हमारे  हिसाब से बच्चों के हाथ में मोबाइल देना आज की आवश्यकता है, मापा-पिता एवं बच्चों दोनों की सहूलियत के लिए है.   
        इस आवश्यकता को हम किस तरह से बच्चों को प्रदान करेंगे,कि वे इस ज़रुरत का ग़लत इस्तेमाल न कर सके,जिसके कारण M.L.A.साहेब बच्चो से इस सुविधा को वापस ले लेना चाहते हैं.
          हमें यह जानना ज़रुरी है की बच्चे इस सुविधा का गलत इस्तेमाल कैसे और क्यों करते हैं.स्मार्ट मोबाइल होने की वजह से और प्रीपेड  सेवा की वजह से.
          स्मार्ट फ़ोन होने की वजह से बच्चे,इन्टरनेट,फेसबुक कैमरा इत्यादि का सही और ग़लत इस्तेमाल करते हैं जिसकी वजह से कभी कभी परेशानिया आ जाती हैं.
          प्रीपेड सेवा होने की वजह से बच्चे अपने जेबख़र्च में से मोबाइल रिचार्ज कराते हैं और बहुत देर देर तक,पता नहीं किस-किस से बातें करते हैं,जिसका पता माता-पिता को नहीं चल पाता है,जो बाद में कभीकभार परेशानी का सबब बनता है.
          कैसा मोबाइल और किस सेवा के साथ मोबाइल हमको बच्चों को देना है,अब यह जानने की बारी आ गयी है.
        1.हमें बच्चों को साधारण मोबाइल देना है,जिसमे इन्टरनेट ना हो कैमरा ना हो,सिर्फ़ बात करने की सुविधा हो,जिससे बच्चे हमें अपने बारे में ख़बर कर सके एवं हम बच्चों की ख़बर ले सकें,बस.
          2.हमें बच्चों को पोस्टपेड मोबाइल सेवा के अंतर्गत कनेक्शन दिलवाना होगा,जिसका बिल माता-पिता के पते पर आयेगा,जिससे उन्हें यह पता रहेगा कि उनका बच्चा किससे  बात करता है,  कितनी देर बात करता है और कितनी बार बात करता है.बच्चे को भी यह डर रहेगा की उसे सही जगह,सही लोगों से संभल कर ही बात करनी है,क्योंकि माता-पिता को सब पता रहेगा
          अब हमें सरकार एवं मोबाइल सर्विस प्रोवाइडर कम्पनियां को साथ में लेकर,उपरोक्त ज़रुरत के अनुरूप मोबाइल सेवा प्रदान करवानी होगी. 
       इस कनेक्शन में निम्न ज़रूरते पूरी होनी चाहिए.
        1.बच्चों के नाम से माता-पिता की सरपरस्ती में पोस्टपेड कनेक्शन आवंटित हो, जिसका बिल माता-पिता के पते पर जाएगा.
        2.इस कनेक्शन में साधारण मोबाइल ही इस्तेमाल होगा,हो सके तो मोबाइल कम्पनियां कम खर्च में अच्छा साधारण मोबाइल दें जिसमे सिर्फ बात हो सके.
        3.छ से बारह वर्ष तक के बच्चों को पचास रूपए प्रति माह में,एवं बारह वर्ष से अट्ठारह वर्ष तक के बच्चों को सो रूपए प्रति माह के हिसाब से बिल बने.
        4.पचास रूपए में पचीस पैसे प्रति मिनट के हिसाब से दो सो मिनट एवं सो रूपए में चार सो मिनट की बात करने की सुविधा मिलनी चाहिए.
        मोबाइल कम्पनियों के लिए भी यह सौदा घाटे का न होकर बहुत फायदे का साबित होगा क्योंकि पढ़ने जाने वाले बच्चों की तादाद भारतवर्ष में कई करोड़ में है.सरकार को भी इस झंझट और बहस से हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाएगा.माता-पिता लोगों को भी बच्चों के लिए होने वाले एक तरह के तनाव से मुक्ति मिलेगी.                                                                                                                                                                                                 हाँ कुछ बड़े बच्चों को जो बच्चे होने के बावजूद कुछ ज्यादा आज़ादी चाहते है, और अपने-आप को अट्ठारह वर्ष से कम होने के बावजूद भी व्यस्क समझने की भूल करते हैं, उन्हें हमारे इस सुझाव से कुछ अड़चन हो सकती है,जिसके लिए हमें कोई खेद नहीं है, क्योंकि हम यह कार्य उनकी,उनके माता-पिता एवं समाज की भलाई के लिए करना चाह रहे हैं. 
      अगर आपको हमारा यह प्रयास एवं सुझाव पसंद आये तो हमें ज़रूर बताए.धन्यवाद्.
       
   K.C.MEHROTRA
   33/001,  Dayal Building, Near WARDROBE
    Maqbara Road,Hazratganj, LUCKNOW-226001.
    Mobile No.         09335200525,  09918800525
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Tuesday, 13 May 2014

वृदधावस्था के अँधेरे से उजाले की ओर ......... कैसे ?

वृदधावस्था  के अँधेरे से किसे डर नहीं लगता. ख़ास कर तब जब आपके पास उस अँधेरे से निकलने के लिए पर्याप्त साधन या व्यवस्था न हो. आपने अपने रिटायरमेंट के लिए कोई तैयारी ना कर रखी हो और आप किसी सरकारी नौकरी से रिटायर भी न हो रहे हों.

ऐसी अवस्था में आपके जेहेंन  में तरह तरह के ख़याल आयेंगे. अपने आप को लेकर, अपनी पत्नी को लेकर, दोनों के स्वास्थ को ले कर, ज़िन्दगी की अन्य ज़रूरतों को लेकर, आगे की ज़िन्दगी कैसे कटेगी, कितनी ज़िन्दगी बची है, कहीं बहुत ज्यादा तो नहीं. ऐसी अवस्था में अक्सर आदमी टूट जाता है, अवसाद में घिर जाता है. बीमार न होते हुए भी बीमार हो जाता है और कभी कभी डिप्रेशन में चला जाता है. और शायद मृत्यु आने से पहले ही मृत प्रयः हो जाता है.

ऐसी दशा शायद हमारी भी होती क्यूंकि वो सारी परिस्थितियां हमारी भी है. परन्तु नहीं, शायद हम बहुत भाग्यशाली है क्यूंकि हमे हमारी वृदधावस्था के अँधेरे को चीरकर सुख एवं समृधि की ओर ले जाने वाली दो किरणें हमे साफ़ दिखाई दे रही है जो हमे भविष्य में सुखमय जीवन प्रदान करेंगी.

वो दो किरणें हमारे दो अनमोल रतन है जिनसे हमे आशा ही नहीं, पूर्ण विश्वास है की कुछ भी क्यूँ न हो जाए, ये हमारे दोनों पुत्र, हम दोनों के सुखद भविष्य के चमकते सितारे है.

भगवान् इन दोनों को दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की से तथा उनके मन में बड़ों की सेवा करने का मनोबल बनाये रखे तथा समाज एवं मानवता की सेवा करने का जो जज्बा उनमे है वो बना रहे. हमारा ऐसा आशीर्वाद है.  

WHAT INSURANCE ACTUALLY IS, DO YOU KNOW?


  1. Kya aap vaakai jaante hai ki insurance kya hai?
  2. Kya aap jaante hai ki insurance cover(sum assured)kya hota hai?
  3. Kya aapko pata hai ki aapke uuper insurance cover kitne ka hai
  4. Kya aapko pata hai ki aapke uuper kitne ka insurance cover hona chahia?
  5. Kya aap yeh soch ker khush hai ki aap bahut jyaada paisa insurance premium de rahe hai isliye aap per bahut bada insurance cover hoga ya hai?
  6. Kya aapne apne jaan pahchaan, milne wale ya ristedaar se insurance khareeda hai?
  7. Kya aapko lagta hai ki aapke agent ya uske saath aay adhikaari ne dhokhe me rakhker ya jhooth bolker aapko policy bechi hai?
  8. Kya aapko lagta hai ki aapko jo bataya gaya tha woh policy aap ko nahi di gai?
  9. Kya aapko lagta hai ki aap desi videshi,nai ya purani kisi bhi insurance co. ke sataae hua hai (dhokha khae hua hai)?
  10. Kya uuper diye koi bhi prashan aapko apne lagte hai?

          AGAR woh agent ab us co. me nahi hai tatha aapki policy ko dekhne wala koi nahi hai,aur aapko lagta hai ki aapne aise aadmi se insurance khareeda jo industry me tik nahi paya, TO aapko aise aadmi se paramarsh lena chahiye,jo iss insurance industry me aapko sahi disha-nirdesh de sake.

         Hum aapka swagat karte hain. aap phone ker ke apne baare me avam apni policy ke baare me bata ker samay le ker neeche diye pate per mile.ho sakta hai hum aapke phanse hue ya shayad aapki najar me doobe hue rupye aapko vaapas dilwane ka tareeka bataane me kaam aa sake,avam aapko aapke sahi insurance ke baare me bata saken

Thanks,
KCSIR
Krishan Chandra Mehrotra
33/001, Dayal Building (near WARDROBE showroom) 
Maqbara Road, Hazratganj, LUCKNOW - 226001
Mo.No..09335200525, 09918800525 Office Phone: 0522-2200525
email id - kcsir@kcsir.in 
website - www.kcsir.in

Friday, 2 May 2014

1.kya aap health insurance ke baare me jaante hain?
2.kya aapko health insurance karwana chaahiye?
3.kya aapko health insurance karwane ke phayede pata hain?
4.kya aapko pata hai ki health insurance hone se bimaari aane per ya accident hone per ilaaj muft me hota hain?
5kya aapko pata hai ki aapke pure pariwar ka health insurance ek saath ho sakta hai?
6kya aap jante hain ki health insurance karwane me kya kharch aata hai?
7kya aapko pata hai ki health insurance karwane ke liye kis-se milna hoga?
        Uper likhe prasan yadi aapke dimaag me aa rahe hain,to aapko turant hamse sampark karna chaahiye,tatha yadi aapko health insurance ke baare me kuch bhi nahi pata hai ,to bhi aapko hamse milna chaahiye.
        Hum aapko health insurance tatha us-se hone wale faayedon ke baare me bata sakte hain,isliye kripya nimn pate avam nos. per sampark kare.


 kc sir         (krishan chandra mehrotra)
 33/001,dayal building,
 maqbara road,(near wardrobe)
 hazratgang,
 LUCKNOW-226001
Mo.no. 9335200525     9918800525
off.no.  0522 2200525