Tuesday, 13 May 2014

वृदधावस्था के अँधेरे से उजाले की ओर ......... कैसे ?

वृदधावस्था  के अँधेरे से किसे डर नहीं लगता. ख़ास कर तब जब आपके पास उस अँधेरे से निकलने के लिए पर्याप्त साधन या व्यवस्था न हो. आपने अपने रिटायरमेंट के लिए कोई तैयारी ना कर रखी हो और आप किसी सरकारी नौकरी से रिटायर भी न हो रहे हों.

ऐसी अवस्था में आपके जेहेंन  में तरह तरह के ख़याल आयेंगे. अपने आप को लेकर, अपनी पत्नी को लेकर, दोनों के स्वास्थ को ले कर, ज़िन्दगी की अन्य ज़रूरतों को लेकर, आगे की ज़िन्दगी कैसे कटेगी, कितनी ज़िन्दगी बची है, कहीं बहुत ज्यादा तो नहीं. ऐसी अवस्था में अक्सर आदमी टूट जाता है, अवसाद में घिर जाता है. बीमार न होते हुए भी बीमार हो जाता है और कभी कभी डिप्रेशन में चला जाता है. और शायद मृत्यु आने से पहले ही मृत प्रयः हो जाता है.

ऐसी दशा शायद हमारी भी होती क्यूंकि वो सारी परिस्थितियां हमारी भी है. परन्तु नहीं, शायद हम बहुत भाग्यशाली है क्यूंकि हमे हमारी वृदधावस्था के अँधेरे को चीरकर सुख एवं समृधि की ओर ले जाने वाली दो किरणें हमे साफ़ दिखाई दे रही है जो हमे भविष्य में सुखमय जीवन प्रदान करेंगी.

वो दो किरणें हमारे दो अनमोल रतन है जिनसे हमे आशा ही नहीं, पूर्ण विश्वास है की कुछ भी क्यूँ न हो जाए, ये हमारे दोनों पुत्र, हम दोनों के सुखद भविष्य के चमकते सितारे है.

भगवान् इन दोनों को दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की से तथा उनके मन में बड़ों की सेवा करने का मनोबल बनाये रखे तथा समाज एवं मानवता की सेवा करने का जो जज्बा उनमे है वो बना रहे. हमारा ऐसा आशीर्वाद है.  

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