Wednesday, 15 October 2014

  डिस्पोसब्ल गुड्स के इस्तेमाल से बनते कूड़े का नॉन-डिस्पोसब्ल अम्बार        दुबारा इस्तेमाल में न लाने वाले सामान के लिए डिस्पोसब्ल शब्द का इस्तेमाल करके क्या नाम रखने वाले ने गलती करी? आप विचार करें सोचें, समझें, ध्यान लगाएं और फिर अपने विचारों से हमें अवगत करायें.

        स्वच्छ भारत के मोदी जी के आवाहन के मद्दे नज़र,अगर हम विचार करें तो हम पायेंगे कि कूड़ा इस अभियान का असली हीरो है,कुछ लोगों की नज़र में यह विलेन यानि खलनायक भी हो सकता है,क्योंकि इस कूड़े को ही हटा कर भारत को स्वच्छ बनाया जा सकता है जो की मोदी जी चाहते हैं.
        स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत करते समय शायद मोदीजी ने यह इतने आगे तक नहीं सोचा होगा की आज भारत में कूड़ा कैसा होता है,या कितने प्रकार का होता है.
        क्या आज के भारत का कूड़ा सफेदपोश नेता, अधिकारी,बड़े-बड़े कारोबारी,खिलाड़ी इत्यादि के सिर्फ झाड़ू लगा देने भर से साफ़ हो जायेगा?
         आज के भारत का कूड़ा आज से तीस साल पहले के भारत के कूड़े से बहुत अलग किस्म का हो गया है.तीस-चालीस साल पहले के भारत के कूड़े को एक गड्डे में गाड़ कर मट्टी से बंद कर छोड़ देने पर कम्पोस्ट खाद बन जाती थी जो खेतों में काम आती थी ,ऐसा हमने पढ़ा था.अगर उस तरह का कूड़ा आज भी होता तो इस सफाई अभियान से बहुत फायेदा होने वाला था.
     मगर साहेब आज के भारत का कूड़ा बड़ा जड़ीला हो गया है,शायद आज के भारतके............जैसा. आप समझदार है खुद समझ लें.
          अगर हमें कूड़ा साफ़ करना है और एक स्वच्छ भारत की तस्वीर दुनिया को दिखानी है, (जो कि हमें अवस्य करना है.) तो हमें पहले समझना होगा की भारत में कहाँ,किस जगह,किस तरह का कूड़ा पाया जाता है,और उसे साफ़ करने के लिए कौन सा तरीका या विधि अपनानी पड़ेगी.
          आज के कूड़े में दो तरह के पदार्थ पाए जातें हैं,
1. वो जो नष्ट हो जाते हैं.
2. वो जो नष्ट नहीं होते हैं.
           वो कूड़ा जो नष्ट हो जाता है हमारे आपके लिए चिंता का विषय भी नहीं है,क्योंकि यह कूड़ा सदियों से है और आसानी से इसे साफ़ किया जा सकता है,या इससे खाद बनाई जा सकती है.परन्तु वो दूसरे प्रकार का कूड़ा जो नष्ट नहीं होता,आज पुरे संसार के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है.
            अब हम अपने असली मुद्दे,यानि डिस्पोसब्ल गुड्स के इस्तेमाल से होने वाले नॉन डिस्पोसब्ल कूड़े के बढ़ते अम्बार से कैसे बचा जा सकता है पर आते हैं.
              तरह -तरह के डिस्पोसब्ल गुड्स आज भारत में इस्तेमाल होने लगे हैं,जो कुछ इस प्रकार हैं;
1.चाय पीने के लिए कप,जो की पी.पी.प्लास्टिक या प्लास्टिक कोटेड पेपर से बने होते हैं और आजकल सारे हिन्दोस्तान में करोड़ों की तादाद में रोजाना इस्तेमाल हो रहे हैं,यह कप सहरों की नालियों में आपको हजारों की तादाद में पड़ें मिलेंगे जो की नालियों को चोक करने का काम बखूबी करते हैं.
2.खाना खाने वाली प्लास्टिक की या थर्मोकोल की थालियाँ,प्लेट,चम्मच कटोरी इत्यादि जिनका चलन दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है,कूड़ा बनाने में बहुत मददगार साबित हो रही हैं.
3.पी .वी.सि.कोटेड पाउच,जो की पान मसाले,तम्बाकू, बच्चों की टॉफी,दूध,रसोई के मसाले,चोकलेट,आलू चिप्प्स इत्यादि न जाने किस-किस चीजों को पैक करने के काम आ रहे हैं,पुरे देश भर में सड़कों पर,नालियों में,रेलवे लाइन के किनारे बिखरे नज़र आयेंगे जो कि आने वाले समय में बहुत विकराल रूप लेने वाले हैं.
4.पी.वी.सि.या पी.पी. प्लास्टिक से बने लिफाफे, थैलियाँ और झोले भी आज नॉन डिस्पोसब्ल कूड़े को बढाने में बहुत सहायक हो रहे हैं.
5.मेडिकल लाइन में इस्तेमाल होने वाली सिरिंज और प्लास्टिक की टेस्ट टयुब,स्टूल और यूरिन टेस्ट में इस्तेमाल होने वाली डिब्बियां भी इस कूड़े को बढाने का काम कर रहे हैं.
6.आजकल एक और चीज है जो गन्दगी को बढ़ा रही है वो है बच्चों और बड़ों के द्वारा इस्तेमाल होने वाले डैपेर(diper).
            विकसित देशों ने डिस्पोसब्ल गुड्स के इस्तेमाल के बाद बनते कूड़े को रीसायकल करने का प्रबंध करके इस कूड़े से फिर से सामान बनाने का इंतजाम कर लिया है,जिससे उन देशों में डिस्पोसब्ल गुड्स का कूड़ा उतनी भयंकर इस्थिति में नहीं पहुँच पा रहा है जितना कि भारत में
             भारत में डिस्पोसब्ल गुड्स से उत्पन्न हुए कूड़े का प्रबंधन करना,यानि उसे अलग अलग श्रेडियों में छाटना,बीनना,बाटना और फिर उसे रीसायकल करना अभी न के बराबर हो पा रहा है.
              जबतक हम भारत में डिस्पोसब्ल गुड्स के कूड़े को सड़कों ,नालियों और कूड़ाघर में जाने के बजाये वापस कारखानों में रीसायकल होने के लिए भेजने का इंतजाम करने में सक्षम नहीं हो जाते तब तक शायद हम स्वच्छ भारत के सपने को साकार करने में विफल रहेंगें.
            क्योंकि डिस्पोसब्ल शब्द का इस्तेमाल इसलिये किया गया था की आप स्तेमाल करें डिस्पोस करें और उसे फिर से बना कर फिर इस्तेमाल करे, और यह चेन बनी रहे,न कि एक बार इस्तेमाल करके उसे कूड़े में दाल दो.
            आप सब से हमारी यही प्रर्थना है की आप कम से कम डिस्पोसब्ल गुड्स का इस्तेमाल करें,जितना हो सके ना करें,जितना करें,उसको सही तरीके से सही जगह पर डिस्पोस करने का कष्ट करें और मोदी जी के स्वच्छ भारत के सपने को साकार करने में अपनी भागेदारी निभाएं.                                     धन्यवाद.

Saturday, 11 October 2014


  लंगड़ी चींटी जैसी चाल का मारा,भारतीय इन्टरनेट उपभोक्ता बेचारा

         ऐसा बताया जाता है की भारत में ऐसे बेचारे,एक दो या दस बीस हज़ार या सौ दो सौ लाख नहीं,बल्कि करीब पचीस करोड़ हो गए हैं.सुनने में कुछ अजीब सा लगता है फिर हँसी भी आती है,क्योंकि यह सारे बेचारे,अपने को बेचारा कहे जाने पर नाराज भी हो सकते हैं,क्योंकि इनमे से ज्यादा तर पढ़े-लिखे,अच्छी हैसीयत वाले,सम्भ्रान्त नागरिक हैं.
          अब आप जानना चाहेंगे कि यह सब बेचारे कैसे बन गए? 
         मेरी नज़र में जो मनुष्य अपनी गलती न होने के बावजूद,दूसरों की गलतियों की सजा भुगतने पर मजबूर हो,बार-बार लगातार,तथा उनकी सुनने-वाला कोई न हो,तो वे व्यक्ति बेचारे कहलाने योग्य हो जाते है.
         यह भारतीय इन्टरनेट उपभोक्ता अपने-आप में तो बेचारे हैं,परन्तु पूरी दुनिया की आबादी के हिसाब से देखा जाये तो भारत इन्टरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या के हिसाब से दुनिया में दूसरे नम्बर पर आता है,परन्तु यह भी सत्य है की यदि आबादी के प्रतिशत के हिसाब से भारत में इन्टरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या देखी जाये तो यह दुनिया के देशों में नवें स्थान पर है.
          अब बात यह आती है की,जब दुनिया में इन्टरनेट इस्तेमाल करने वालों में भारतीय उपभोक्ता नम्बर दो पर है तो फिर वोह बेचारा कैसे हो गया?
     भारतीय इन्टरनेट उपभोक्ता को बेचारा बनाने वाले निम्न कारण हैं:
1. अमेरिका के इन्टरनेट उपभोक्ता जिस एक mb data के लिए ३००/०० भारतीय रूपए खर्च करते हैं,भारतीय उपभोक्ता उसी एक mb data के लिए ३३००/०० भारतीय रूपए(मतलब ग्यारह गुना ज्यादा )खर्च करते हैं.और इसके बावजूद दाम अभी भी दिन दुने रात चौगुने वाली कहावत के अनुरूप बढ़ रहे हैं.
2.  अमेरिका या अन्य देशों में जो स्पीड इन्टरनेट की मिलती है हमारे भारत में उससे दस गुना कम स्पीड   मिलती है.
3.  भारत में जो स्पीड आपके प्लान में आपको बताई जाएगी उसकी आधी या चौथाई स्पीड भी अगर आपको प्राप्त हो जाये तो आप अपने आपको बहुत भाग्यशाली समझियेगा ,हालांकि ऐसा होना,निकट भविष्य में तो संभव दिखता नहीं है.
4.  अगर आपको बताया गया की आपके प्लान की स्पीड 3.1mbps है तो समझ लीजिये की आपको जो स्पीड आएगी वोह,ज्यादा से ज्यादा 300kbps होगी,वोह भी कभी कभी,झलक दिखलाएगी.लंगड़ी चींटी की चाल जैसी दो सेकंड के लिए 50kbps,फिर चार सेकंड के लिए 15kbps,फिर तीन सेकंड के लिए 80kbps,फिर पांच मिनट के लिए 0kbps,फिर तीस सेकंड के लिए 300kbps.यह आँख-मिचौली हमारे उपभोक्ता को खेलनी पड़ती है,या यों कहिये कि झेलनी पड़ती है.
                  उपरोक्त कारणों की वजह से भारतीय इन्टरनेट उपभोक्ता बेचारा बन कर रह गया  है                  आज अपने प्रधानमंत्री मोदी जी, जो कि हर तरह से, हर काम में आगे से आगे इन्टरनेट के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की बात करते हैं,क्या भारतीय इन्टरनेट उपभोक्ता की इस बेचारगी से अनभिज्ञ हैं? यदि ऐसा है तो और भी दुखद बात है और यदि ऐसा नहीं है तो उन्हें भारतीय इन्टरनेट की इस दुर्दशा की तरफ फ़ौरन ध्यान देकर इसको स्वस्थ, बलवान एवं स्फूर्तिवान बनाने की तरफ पूरा ध्यान देना चाहिए, क्योंकि वे जिस ओर भारत को ले जाना चाहते हैं,उस गंतव्य की पहली,दूसरी और तीसरी सीढ़ी है:                                           1. इन्टरनेट की सहज उपलब्धता
2. इन्टरनेट की असीमित गति एवं
3. इन्टरनेट की सस्ती दरें
        जिस दिन भारत इन्टरनेट की दुनिया में विकसित देशों के समकक्ष खड़ा हो पायेगा ,उसदिन से ही हम मोदी के सपनो का भारत देख पाएंगे अन्यथा नहीं,इस बात को हमारे प्रधानमंत्री एवं उनके दूरसंचारमंत्री जितनी जल्दी समझेंगे उतना अच्छा होगा.
        इसलिये कृपया इन्टरनेट सर्विस प्रोवाइडर कम्पनियों की मनमानी रोकिये रोज दाम बढ़ानेवाली प्रतिस्पर्धा बंद कीजिये तथा दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई)को उनके कार्य छेत्र की जानकारी कराइए, की यह प्राधिकरण उपभोक्ता की भलाई के लिए बनाया गया था, न कि सर्विस प्रोवाइडर कम्पनियों की जेबें भरने में मदद करने के लिए,क्योंकि पिछले छ-आठ महीने में इन्टरनेट सेवाओं के दाम जिस मनमाने तरीके से बढ़ें हैं और आज भी बढ़ रहे है ऐसा लगता नहीं है की कोई नियामक प्राधिकरण कार्य भी कर रहा है.
         २०१२ में जब ख़बर आयी थी की अनिल अम्बानी के भाई दूरसंचार के छेत्र में आ रहे है तभी उनकी तरफ से अखबारों में छपा था की उनकी कम्पनी इन्टरनेट की उस समय चल रही दरों को दस गुना कम कर देंगी.परन्तु ,उस समय की दरों से दो से तीन गुना दाम बढ़ चुके हैं(यानि की अगर उस समय कोई दर १०० रूपए प्रति माह थी,जो मुकेश अम्बानी की कम्पनी १० रूपए प्रति माह करने की बात कर रही थी,वो दर आज १० रूपए की बजाय २०० रूपए या उससे भी अधिक है.) और कोई सुध लेने वाला नहीं है.
          अगर आपको लगे की दूरसंचार के छेत्र में लूट मची हुई है तो कृपया इस लेख के बारे में अपनी राय से हमें अवस्य अवगत कराएँ.
         धन्यवाद                                                                                                                              KC Sir              [K.C.MEHROTRA]
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